सर्वोदय(अम्बेडकरनगर):- उत्तर प्रदेश के जनपद अम्बेडकरनगर से दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है जहाँ एक 6 साल की मासूम बच्ची अनन्या, जो केवल अपनी किताबों के लिए लड़ रही थी—ना कपड़े की चिंता , ना खिलौने की , चिंता थी तो सिर्फ किताबें— इससे बड़ी इंसानियत की मिसाल क्या हो सकती है? और इससे बड़ा क्रूरता का चेहरा क्या हो सकता है कि अधिकारियों ने एक मासूम की पुकार तक नहीं सुनी?
यह घटना न सिर्फ प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर करती है, बल्कि ये भी बताती है कि आज भी हमारे समाज में अनगिनत अनन्या हैं, जो गरीबी में पलते हुए भी शिक्षा के सपने देखती हैं। और उन्हीं सपनों को बुलडोजर के नीचे रौंद दिया जाता है।
“साहब मेरी किताबें अंदर हैं…” — जब बुलडोजर ने एक मासूम की उम्मीदें रौंद दीं
उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर में दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। एक 6 साल की बच्ची अनन्या, अपनी झोपड़ी पर आए बुलडोजर के सामने हाथ जोड़कर खड़ी रही। वो रोती रही, गिड़गिड़ाती रही — “साहब, मेरा घर मत गिराइए… मेरी किताबें अंदर रखी हैं…”। ना उसे अपने कपड़ों की परवाह थी, ना खिलौनों की। सिर्फ और सिर्फ अपनी किताबें—जो उसका सपना थीं, उसका भविष्य थीं। लेकिन अधिकारियों का दिल नहीं पसीजा। योगी सरकार के बुलडोजर ने सबकुछ तास के पत्तों की तरह बिखेर दिया—घर, सपना और भरोसा।
वीडियो में दिखता है—कैसे छोटी सी अनन्या, जान की परवाह किए बिना, दौड़ती है, झोपड़ी के अंदर जाती है और किताबों से भरा झोला लेकर बाहर आती है। तभी पीछे से उसका घर मलबे में तब्दील हो जाता है।
लोग चिल्लाते रहे, रोकने की कोशिश करते रहे। लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
सवाल ये है:
- जब सुप्रीम कोर्ट ने बिना नोटिस घर गिराने पर रोक लगाई है, तो ये बुलडोजर किस कानून के तहत चल रहा था?
- क्या प्रशासन के लिए एक मासूम की किताबों की कोई कीमत नहीं?
- क्या सरकार सिर्फ चुनावी मंचों से “बेटी पढ़ाओ” का नारा देने तक सीमित है?
अनन्या का झोला भले बच गया हो, लेकिन सवालों का बोझ कहीं भारी है।
और ये तस्वीरें बताती हैं—शिक्षा से प्यार करने वाली एक बच्ची हार गई, और सत्ता का बुलडोजर जीत गया।



