न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान से जुड़े हालात का असर अब भारतीय किचन तक पहुंचने लगा है। पहले एलपीजी को लेकर चिंता थी, लेकिन अब खाने के तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है।
पूड़ी, पराठा, समोसा से लेकर रोजमर्रा की सब्जियों तक—हर घर में तेल की खपत होती है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी सीधे आम आदमी के बजट को प्रभावित कर रही है।
एक महीने में तेल के दाम में उछाल
पिछले एक महीने में विभिन्न खाद्य तेलों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है:
- सूरजमुखी तेल: 175 → 181 रुपये/किलो
- पाम ऑयल: 136 → 141 रुपये/किलो
- सोयाबीन तेल: +4 रुपये/किलो
- सरसों, मूंगफली और वनस्पति तेल: +3 रुपये/किलो तक
यह बढ़ोतरी धीरे-धीरे किचन खर्च को भारी बना रही है। खाने का तेल सिर्फ स्वाद ही नहीं बढ़ाता, बल्कि पोषण का भी अहम हिस्सा है। यह शरीर को आवश्यक फैट, ऊर्जा और विटामिन देता है—खासकर उन लोगों के लिए जो सीमित संसाधनों में जीवन यापन करते हैं।
आयात पर बढ़ती निर्भरता बनी बड़ी वजह
भारत में खाने के तेल की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन उतना नहीं बढ़ पा रहा: 56% तेल आयात किया जाता है जबकि 44% घरेलू उत्पादन से आता है | बतादें कि आयात में प्रमुख हिस्सेदारी, पाम ऑयल: 41%, सोयाबीन तेल: 35% एवं सूरजमुखी तेल: 18% होती है | भारत मुख्य रूप से मलेशिया, इंडोनेशिया और अमेरिका से तेल आयात करता है।
- 2022-23 में शहरी खपत: ~12 किलो/व्यक्ति/वर्ष
- ग्रामीण खपत: ~11 किलो/व्यक्ति/वर्ष
- 2004-05 के मुकाबले खपत में बड़ा उछाल
सरकार का कहना है कि मौजूदा वैश्विक तनाव के बावजूद भारत में खाद्य तेल की सप्लाई पर बड़ा संकट नहीं है।
साथ ही आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स-ऑयलसीड्स शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ाना है।
तेल के दाम बढ़ने का मतलब खाना बनाना महंगा इसके अलावा बाहर का खाना भी महंगा होगा कुल मिलाकर घरेलू बजट पर दबाव होगा | अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो आने वाले समय में किचन का खर्च और बढ़ सकता है।




