न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:– संसद में शुक्रवार को पेश किया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका, जिसके चलते यह पारित नहीं हो पाया। हालांकि, इस असफलता का मतलब यह नहीं है कि महिला आरक्षण की प्रक्रिया खत्म हो गई है।
दरअसल, वर्ष 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम अभी भी प्रभावी है और इसके तहत 2029 के आम चुनावों में महिला आरक्षण लागू होने की संभावना बनी हुई है।
सरकार का 131वां संशोधन बिल सीटों की संख्या बढ़ाकर आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के उद्देश्य से लाया गया था। इसमें 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव था। इसके गिरने से सिर्फ सीट विस्तार की योजना पर फिलहाल रोक लगी है, जबकि महिला आरक्षण का मूल प्रावधान सुरक्षित है।
2029 में कैसे लागू हो सकता है आरक्षण?
महिला आरक्षण लागू करने के लिए संविधान में जोड़ा गया अनुच्छेद 334A दो प्रमुख शर्तें तय करता है—
- नई जनगणना का आयोजन
- जनगणना के आधार पर परिसीमन (Delimitation)
यदि ये दोनों प्रक्रियाएं 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पूरी हो जाती हैं, तो महिला आरक्षण लागू करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं रहेगी।
सरकार के पास क्या हैं विकल्प?
सरकार के सामने अभी भी कुछ संवैधानिक रास्ते खुले हुए हैं—
- अनुच्छेद 334A में संशोधन: परिसीमन की शर्त हटाकर मौजूदा 543 सीटों पर ही 33% आरक्षण लागू किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 82 का उपयोग: 2026 के बाद परिसीमन पर लगी रोक हट सकती है, जिससे सीटों का पुनर्गठन संभव होगा।
अभी भी खुला है राजनीतिक रास्ता
संसद में परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े अन्य विधेयक अभी लंबित हैं। सरकार ने इन्हें वापस नहीं लिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि इन्हें मौजूदा लोकसभा कार्यकाल में फिर से पेश किया जा सकता है।
अगर ऐसा होता है, तो परिसीमन आयोग के गठन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और आरक्षण लागू करने का रास्ता और साफ हो जाएगा।
क्या हैं चुनौतियां?
तकनीकी रूप से रास्ता खुला होने के बावजूद कई बड़ी चुनौतियां सामने हैं—
- लोकसभा सीटों की सीमा बढ़ाने के लिए फिर से दो-तिहाई बहुमत जरूरी
- जनसंख्या आधारित सीट पुनर्गठन पर राजनीतिक विवाद
- उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद
हालांकि, अगर सरकार सीटों की संख्या बढ़ाए बिना केवल सीमांकन (delimitation) करती है, तो विपक्ष के साथ सहमति बनने की संभावना ज्यादा मानी जा रही है।



