भगवद गीता पढ़ाने से कोई ट्रस्ट धार्मिक नहीं बन जाता: मद्रास HC की दो टूक, FCRA पर केंद्र को निर्देश

न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि भगवद गीता की शिक्षा देने मात्र से कोई ट्रस्ट धार्मिक संस्था नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि गीता को FCRA के उद्देश्य से धार्मिक ग्रंथ नहीं माना जा सकता और केवल इसी आधार पर किसी संस्था को विदेशी फंडिंग से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन की एकल पीठ ने अर्श विद्या परम्परा ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा FCRA पंजीकरण खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश को अपर्याप्त तर्क और प्रक्रियात्मक खामियों से भरा हुआ बताया।

गृह मंत्रालय को तीन महीने में पुनर्विचार का आदेश

हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह ट्रस्ट के FCRA आवेदन पर तीन महीने के भीतर दोबारा विचार करे। अदालत ने कहा कि यदि किसी तरह के फंड ट्रांसफर को लेकर ठोस सबूत मौजूद हों, तो मंत्रालय नया और विस्तृत नोटिस जारी करे तथा ट्रस्ट को जवाब देने का पूरा अवसर दिया जाए।

ट्रस्ट की गतिविधियां क्या हैं?

अर्श विद्या परम्परा ट्रस्ट की स्थापना वर्ष 2017 में हुई थी। यह ट्रस्ट कोयंबटूर स्थित अर्श विद्या गुरुकुलम के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती के शिष्यों द्वारा बनाया गया है। ट्रस्ट का उद्देश्य—वेदांत और संस्कृत की शिक्षा, योग और हठ योग का प्रचार, योग दर्शन का अध्ययन एवं प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण और संरक्षण, ट्रस्ट भारत के साथ-साथ विदेशों में भी पारंपरिक भारतीय ज्ञान का प्रसार करता है।

क्यों खारिज किया गया था FCRA आवेदन?

रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रस्ट ने 2021 में FCRA पंजीकरण के लिए आवेदन किया था, जो लंबे समय तक लंबित रहा। गृह मंत्रालय ने 2024 और 2025 में स्पष्टीकरण मांगे। नया आवेदन दाखिल करने के बावजूद सितंबर 2025 में मंत्रालय ने पंजीकरण अस्वीकार कर दिया, जिसके खिलाफ ट्रस्ट ने हाई कोर्ट का रुख किया।

गृह मंत्रालय का तर्क था कि ट्रस्ट भगवद गीता, उपनिषद और वेदांत की शिक्षा देता है, इसलिए यह धार्मिक संस्था प्रतीत होती है।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा—“भगवद गीता को किसी एक धर्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह नैतिक विज्ञान और भारतीय सभ्यता का हिस्सा है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वेदांत एक दार्शनिक विचारधारा है और योग शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा सार्वभौमिक अभ्यास है। इनकी शिक्षा देना किसी संगठन को स्वतः धार्मिक नहीं बना देता।

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कोर्ट ने कहा कि FCRA की धारा 11 के तहत पंजीकरण खारिज करने से पहले अधिकारियों को स्पष्ट और ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना होगा, केवल “धार्मिक प्रतीत होता है” जैसे अस्पष्ट आधार स्वीकार्य नहीं हैं।

विदेशी फंड लेने का आरोप भी नहीं टिका

मंत्रालय ने यह भी आरोप लगाया था कि ट्रस्ट ने एक ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) ट्रस्टी से बिना अनुमति 9 लाख रुपये का विदेशी अंशदान लिया। ट्रस्ट ने गलती स्वीकार करते हुए इसे धारा 41 के तहत कंपाउंड करा लिया था और अगस्त 2025 में प्रक्रिया पूरी हो गई थी।

कोर्ट ने कहा कि एक बार उल्लंघन कंपाउंड हो जाने के बाद उसे पंजीकरण अस्वीकार करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके अलावा, अंतिम आदेश में उठाया गया फंड ट्रांसफर का नया आरोप भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ पाया गया।

कोर्ट का अंतिम फैसला

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाई कोर्ट ने FCRA अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया और गृह मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार नए सिरे से फैसला करे और ट्रस्ट को पूरा अवसर दे।

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