जब इंदिरा गांधी ने रखा करवा चौथ का व्रत: बिना पानी के करती थीं उपवास, आडंबर से दूर थीं ‘आयरन लेडी’

न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को आमतौर पर ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है, लेकिन उनकी निजी जिंदगी में परंपरा और अनुशासन का अनोखा मेल था। बहुत कम लोगों को पता होगा कि इंदिरा गांधी करवा चौथ का व्रत भी रखती थीं — और वह भी बिना पानी पिए, सादगी से, पूरी श्रद्धा के साथ।

करवा चौथ का व्रत सिर्फ परंपरा नहीं, आत्मानुशासन था

इंदिरा गांधी की बॉयोग्राफी में लेखक पुपुल जयकर और कथरीना फ्रैंक दोनों ने इस बात का ज़िक्र किया है कि वह कई बार करवा चौथ और अन्य व्रत अपने तरीके से चुपचाप और सादगी से निभाती थीं।

उनकी पुरानी स्टाफ सदस्य सरला मिश्रा के मुताबिक,“मेमसाहब उस दिन दिनभर मौन रहती थीं, शाम को चुपचाप चांद देखकर दीपक से अर्घ्य देतीं और एक गिलास पानी पीकर मुस्कुरा देती थीं।”

ति के लिए नहीं, अपने चुने हुए रिश्ते की स्मृति में व्रत

इंदिरा ने 1942 में फिरोज गांधी से विवाह किया था, जो नेहरू परिवार की इच्छा के विरुद्ध था। विवाह के शुरुआती वर्षों में इंदिरा ने कई बार करवा चौथ का व्रत रखा — न कि सिर्फ पति की दीर्घायु के लिए, बल्कि उस संबंध की गहराई और याद में, जिसे उन्होंने खुद चुना था।

कथरीना फ्रैंक लिखती हैं:“इंदिरा ने परंपरा को कभी बोझ नहीं माना। व्रत उनके लिए आत्मनियंत्रण का प्रतीक था।”

श्रद्धा में दिखती थी सादगी, न श्रृंगार, न आडंबर

इंदिरा गांधी के करवा चौथ व्रत में न कोई भारी साड़ी, न सोलह श्रृंगार।बस एक हल्की खादी की साड़ी, बालों में फूल और हाथ में दीपक। उन्होंने एक बार कहा था: “श्रद्धा तभी सुंदर होती है जब उसमें आडंबर न हो।”

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व्रत से जुड़ा आत्मसंयम और मौन

नवरात्रि हो या करवा चौथ — इंदिरा गांधी अक्सर इन दिनों में फलाहार और मौन का पालन करती थीं।
उनके सचिव यशपाल कपूर ने एक बार बताया: “मेमसाहब के लिए उपवास एक निजी अनुशासन था — न प्रचार, न प्रदर्शन।”

राजनीति में भी व्रत जैसा संकल्प

उनका जीवन और निर्णय लेने की प्रक्रिया भी एक प्रकार के ‘व्रत’ की तरह थी — भीतर से तैयार होना, संयम रखना और निर्णय पर अडिग रहना।

सोनिया और प्रियंका ने भी निभाई परंपरा

1980 के बाद सोनिया गांधी ने भी करवा चौथ रखना शुरू किया, प्रेरणा इंदिरा गांधी से मिली। उन्होंने कहा था:“इंदिरा जी ने कभी व्रत रखने को नहीं कहा, लेकिन जिस संयम से वह खुद निभाती थीं, वही प्रेरणा काफी थी।” बतादें कि अब प्रियंका गांधी भी इस परंपरा को निभाती हैं।

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