सर्वोदय/धर्म:- भारत की धार्मिक संस्कृति में भंडारे एक विशेष स्थान रखते हैं। कोई पर्व हो, सावन के सोमवार, नवरात्र या कोई खास दिन — सड़कों और मंदिरों के पास प्रसाद वितरण के लिए भंडारे लगे दिखाई देते हैं। इनमें पूड़ी, सब्जी, हलवा जैसे व्यंजन आमतौर पर बांटे जाते हैं। पर क्या हर किसी को यह भंडारे का खाना खाना चाहिए? इस सवाल पर प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने महत्वपूर्ण बात कही है।
प्रेमानंद महाराज का मानना है कि मुफ्त में किसी भी चीज को ग्रहण करना धर्म की दृष्टि से उचित नहीं है, खासकर अगर व्यक्ति सक्षम हो। उन्होंने कहा कि कई लोग सिर्फ स्वाद या सुविधा के लिए भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं, जबकि वह जरूरतमंदों और साधु-संतों के लिए होता है।
उन्होंने कहा कि अगर आप भूखे हैं तो घर जाकर नमक-रोटी खा लीजिए. उपवास रहकर परिक्रमा कर लीजिए. लेकिन मुफ्त खाना कभी न खाएं, इससे पुण्य की हानि होती है.
“भूख लगे तो घर जाकर नमक-रोटी खाइए, लेकिन मुफ्त का भंडारा न खाइए। अगर आप साधु-संत नहीं हैं तो सिर्फ स्वाद के लिए खाना लेना पुण्य की हानि करता है।” – प्रेमानंद महाराज
प्रेमानंदर महाराज ने कहा कि आप साधु नहीं हैं. संत नहीं हैं. और भंडारे का आयोजन करने वाले तो आपको खाने के लिए बुलाएंगे ही. लेकिन आप उनका दिल दुखाए बिना प्रणाम कहकर वहां से निकल जाइये. आपको यह सोचना चाहिए कि हम भी पैसा कमाएं और लोगों को हलवा बांटें. खाने की जरूत नहीं है.
प्रेमानंद महाराज ने यह भी कहा कि अगर आप गृहस्थ हैं और किसी आश्रम में जा रहे हैं तो वहां भोजन करने के बाद कुछ रुपया जरूर दे दें. उन्होंने कहा कि मुफ्त में भोजन कभी नहीं करना चाहिए. मुफ्त में कोई सेवा नहीं लेनी चाहिए. तभी आपको पुण्य प्राप्त होगा.



