न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। जहां समाजवादी पार्टी (SP) अपने PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे भाजपा को चुनौती देने में जुटी है, वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती ने भी DMP (दलित-मुस्लिम-पिछड़ा) फार्मूला लेकर मैदान में उतर चुकी हैं। अब यूपी के रण में PDA बनाम DMP की दिलचस्प टक्कर दिखने लगी है।
बसपा का DMP अभियान: बूथ स्तर तक संगठन विस्तार
मायावती ने अपने नए अभियान के तहत हर विधानसभा क्षेत्र में दो संयोजक नियुक्त करने के निर्देश दिए हैं। प्रत्येक संयोजक अपने क्षेत्र में 120-120 दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के सह-संयोजक बनाएगा, जो “भाईचारा कमेटियों” के जरिए बूथ स्तर पर पार्टी की नीतियों को जनता तक पहुंचाएंगे।
इस अभियान का मकसद — पार्टी का जनाधार बढ़ाना और बूथ स्तर पर संगठन को फिर से मजबूत बनाना है।
मायावती का ताबड़तोड़ ऐक्शन
9 अक्टूबर को कांशीराम परिनिर्वाण दिवस के बाद मायावती ने लगातार चार बैठकों का आयोजन किया और पार्टी नेताओं को सख्त निर्देश दिए कि वे “ग्राउंड पर एक्टिव” हों।
उन्होंने यह भी कहा कि जनता को यह बताया जाए कि बसपा सरकारों में दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के लिए क्या कार्य किए गए।
लखनऊ और अलीगढ़ मंडलों में सरवर मलिक और रामदास सविता जैसे समन्वयक बूथ स्तर पर बैठकें कर रहे हैं और संयोजक बनाने की प्रक्रिया में जुटे हैं।
सपा के PDA की काट में उतरी बसपा
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बसपा का DMP फॉर्मूला सपा के PDA अभियान की सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
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अब तक सपा प्रमुख अखिलेश यादव PDA को अपनी चुनावी रणनीति का “अचूक हथियार” मान रहे थे, लेकिन मायावती के नए दांव से उनकी टेंशन बढ़ सकती है।
बसपा में प्रत्याशी चयन की गुपचुप शुरुआत
सूत्रों के मुताबिक, बसपा ने 2027 विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया चुपचाप शुरू कर दी है। पार्टी का फोकस “जनाधार वाले योग्य चेहरों” पर रहेगा। हर उम्मीदवार की लोकप्रियता और क्षेत्रीय पकड़ का आकलन किया जाएगा, फिर टिकट पर अंतिम मुहर लगेगी।
राजनीतिक समीकरण पर नजर
2027 के चुनाव में भाजपा, सपा और बसपा तीनों दलों की रणनीतियां पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर टिके हैं। जहां भाजपा सामाजिक इंजीनियरिंग पर भरोसा जता रही है, वहीं सपा का PDA और बसपा का DMP दोनों दलित, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने में जुटे हैं। यही वजह है कि यूपी की सियासत में इस समय बूथ स्तर पर सबसे बड़ा राजनीतिक अभियान चल रहा है।



