UP चुनाव से पहले आरक्षण के मुद्दे पर सवर्णों की नाराजगी, प्रदर्शन से बढ़ी BJP की चिंता

लखनऊ/सर्वोदय  न्यूज़:  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले आरक्षण के मुद्दे ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ रविवार को राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन हुआ, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर है। आंदोलन के जोर पकड़ने की स्थिति में इसका असर उत्तर प्रदेश की राजनीति और खासतौर पर भाजपा के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक पर पड़ने की चर्चा शुरू हो गई है।

हालांकि, आंदोलन को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार सक्रिय नजर आ रही है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आरक्षण में सुधार की मांग कर रहे छात्रों और युवाओं को आश्वासन दिया है कि उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाया जाएगा।

ब्रजेश पाठक ने प्रदर्शनकारियों से की बातचीत

उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने शनिवार को नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रस्तावित आरक्षण सुधार आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं के साथ बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि छात्रों और युवाओं की मांगों को गंभीरता से केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखा जाएगा।

छात्र प्रतिनिधिमंडल में हर्ष दुबे, मृत्युंजय पाठक और शिवा शर्मा समेत अन्य लोग शामिल रहे। पाठक ने प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों को लेकर अगले कुछ दिनों में केंद्रीय स्तर पर बातचीत का रास्ता तैयार किया जाएगा।

जाति जनगणना को लेकर भी सवर्णों में चिंता

आरक्षण के मुद्दे को लेकर भाजपा के भीतर भी चिंताओं की चर्चा सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि जाति जनगणना के फैसले के बाद सवर्ण वर्ग में आशंकाएं बढ़ी हैं।

कुछ नेताओं की चिंता है कि जातीय आंकड़े सामने आने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग और तेज हो सकती है। ऐसे में चुनावी साल में यह मुद्दा भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।

NDA में भी आरक्षण को लेकर अलग-अलग मांगें

आरक्षण का मुद्दा केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है। NDA के कुछ सहयोगी दल भी आरक्षण को लेकर अलग मांगें उठा रहे हैं।

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 65 फीसदी किए जाने की मांग का समर्थन किया है। उनकी पार्टी ने अपने संगठनात्मक सम्मेलन में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया है।

दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान आरक्षण की समीक्षा के विचार का विरोध कर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि आरक्षण को लेकर सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए तैयार है। वहीं केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए इसे खत्म करने की मांग को असंवैधानिक करार दिया है।

मायावती ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग का किया विरोध

आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष भी सरकार को घेरने में जुटा है। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग का विरोध किया है।

मायावती का कहना है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान ऐतिहासिक भेदभाव और सामाजिक वंचना को दूर करने के उद्देश्य से किया गया था।

प्रदर्शनकारियों की क्या हैं प्रमुख मांगें?

दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने आरक्षण और सरकारी योजनाओं में पात्रता तय करने के दौरान आर्थिक स्थिति को भी प्रमुख आधार बनाने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जाति से अलग हटकर सरकारी सहायता और अवसर मिलने चाहिए।

प्रमुख मांगों में क्रीमी लेयर का नियम लागू करना, मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा और शिक्षा व रोजगार से जुड़ी नीतियों में बदलाव शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों ने UGC की व्यवस्था और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाते हुए व्यापक समीक्षा की मांग की।

एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि उनका विरोध आरक्षण के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार को लेकर है। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर सभी वर्गों की समस्याओं पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।

UP चुनाव से पहले कितना असर डालेगा मुद्दा?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से अहम हो सकता है। यदि आंदोलन का विस्तार होता है और सवर्ण समाज के बीच नाराजगी बढ़ती है, तो भाजपा के लिए अपने सामाजिक समीकरण को साधना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

फिलहाल सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों से संवाद की कोशिश की जा रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य सरकार की प्रतिक्रिया तथा आंदोलन की दिशा पर सभी राजनीतिक दलों की नजर रहेगी।

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