Wednesday, February 11, 2026

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‘योगी विरोधी खुशफहमी न पालें’, शंकराचार्य विवाद पर उमा भारती की सफाई, दो पोस्ट में किया रुख स्पष्ट

न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच जारी टकराव के बीच अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर भी अलग-अलग स्वर सुनाई देने लगे हैं। इस विवाद पर मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने खुलकर अपनी राय रखी है। हालांकि, उनके बयान के बाद पैदा हुई राजनीतिक अटकलों को शांतड्ढते हुए उमा भारती ने साफ किया है कि उनका कथन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ नहीं है।

मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर उमा भारती ने करीब सात घंटे के अंतराल में दो पोस्ट साझा कीं। पहली पोस्ट में उन्होंने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए, जबकि दूसरी पोस्ट में उन्होंने “योगी विरोधी खुशफहमी न पालें” लिखते हुए अपनी स्थिति को स्पष्ट किया।

उमा भारती ने अपनी पहली पोस्ट में लिखा कि उन्हें विश्वास है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच कोई सकारात्मक समाधान जरूर निकलेगा। हालांकि, उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किसी व्यक्ति से शंकराचार्य होने का प्रमाण मांगने को मर्यादा और अधिकारों का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि किसी को शंकराचार्य मानने या न मानने का अधिकार केवल शंकराचार्य परिषद या विद्वत परिषद को है, न कि प्रशासन को।

उमा भारती ने लिखा, “मुझे विश्वास है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज एवं उत्तर प्रदेश सरकार के बीच कोई सकारात्मक समाधान निकल आएगा, किंतु प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा शंकराचार्य होने का सबूत मांगना, यह अपनी मर्यादाओं एवं अधिकारों का उल्लंघन है। यह अधिकार केवल शंकराचार्यों एवं विद्वत परिषद का है।”

इस पोस्ट के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गईं और इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बयान के तौर पर देखा जाने लगा। इसी को लेकर उमा भारती ने करीब सात घंटे बाद दूसरी पोस्ट कर सफाई दी।

दूसरी पोस्ट में उन्होंने लिखा, “योगी विरोधी खुशफहमी न पालें। मेरा कथन योगी जी के विरुद्ध नहीं है। मैं उनके प्रति सम्मान, स्नेह एवं शुभकामना का भाव रखती हूं। किंतु मैं इस बात पर कायम हूं कि प्रशासन कानून-व्यवस्था पर सख्ती से नियंत्रण करे, लेकिन किसी के शंकराचार्य होने का सबूत मांगना मर्यादा का उल्लंघन है। यह कार्य केवल शंकराचार्य या विद्वत परिषद ही कर सकते हैं।”

गौरतलब है कि यह विवाद मौनी अमावस्या के दिन तब शुरू हुआ था, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे और प्रशासन ने उन्हें रोक दिया था। इसके बाद से मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद इस समय माघ मेले में अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठे हुए हैं। उनकी मांग है कि प्रशासन मौनी अमावस्या के दिन की गई कार्रवाई के लिए माफी मांगे और उन्हें ससम्मान संगम स्नान की अनुमति दी जाए।

वहीं मेला प्रशासन की ओर से उन्हें दो बार नोटिस जारी किए जा चुके हैं। इन नोटिसों में उनसे यह पूछा गया है कि वह स्वयं को शंकराचार्य किस आधार पर कह रहे हैं। प्रशासन ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो माघ मेले में शिविर के लिए दी गई भूमि वापस ली जा सकती है और उन्हें भविष्य में प्रतिबंधित भी किया जा सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच उमा भारती का बयान भाजपा के अंदर संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने शंकराचार्य की मर्यादा का समर्थन भी किया और मुख्यमंत्री योगी के प्रति अपना सम्मान भी स्पष्ट कर दिया।

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