रेबीज़ फ्री राजस्थान: चुनौतियाँ और समाधान

न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज:- रेबीज़ एक घातक वायरस जनित रोग है, जो मनुष्यों और जानवरों दोनों को प्रभावित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर वर्ष लगभग 59,000 लोग रेबीज़ के कारण अपनी जान गंवाते हैं, जिनमें से 40% पीड़ित 15 वर्ष से कम आयु के होते हैं। भारत में यह संख्या 20,000 मौतों प्रति वर्ष तक पहुंचती है। डॉ. हेमंत कुमार (पशु शल्य चिकित्सक), डॉ. मंगीलाल(पशु चिकित्सक), डॉ. वीरेंद्र कुमार (पशु चिकित्सक) एवं डॉ. जयदीप भदौरिया (पशु चिकित्सा अधिकारी) के अनुसार

राजस्थान में वर्तमान स्थिति (2025 तक)

  • डॉग बाइट्स के मामले: बीते एक वर्ष में 4.22 लाख से अधिक मामले दर्ज, यानी प्रतिदिन औसतन 1,100 से अधिक।
  • वैक्सीन की मांग:86,965 से अधिक एंटी-रेबीज़ टीकों की मांग राज्यभर में दर्ज हुई।

सरकारी नीति और पहल

राजस्थान सरकार ने अक्टूबर 2023 में राज्य कार्य योजना (State Action Plan) की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य है 2030 तक राज्य को रेबीज़ मुक्त बनाना।

अगस्त 2025 में लागू की गई नीतियाँ:

  • ABC (Animal Birth Control) नियमावली 2023 के तहत राज्यभर में पशु नियंत्रण, टीकाकरण और फीडिंग पॉइंट्स का वैज्ञानिक प्रबंधन।
  • CCTV निगरानी, स्थानीय समितियाँ, और प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा मानवीय ढंग से कुत्तों को पकड़ने की व्यवस्था।
  • स्टेरिलाइजेशन और टैगिंग के बाद कुत्तों को उनके मूल क्षेत्र में ही छोड़ा जाता है।

प्रमुख चुनौतियाँ

क्रम चुनौती विवरण
1. तेज़ी से बढ़ते डॉग-बाइट केस विशेषकर शहरी क्षेत्रों में असंतुलित जनसंख्या
2. विभागीय जिम्मेदारी का असंतुलन स्वास्थ्य विभाग केवल इलाज तक सीमित, रोकथाम की ज़िम्मेदारी नगर निगम व पशुपालन विभाग पर
3. संसाधनों की कमी पर्याप्त ट्रेन्ड स्टाफ, वैक्सीनेशन सेंटर और रिकॉर्डिंग सिस्टम का अभाव
4. जागरूकता की कमी ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से बचाव और उपचार संबंधी जानकारी का अभाव
5. मानव-पशु संघर्ष असुरक्षा की भावना से समाज में आक्रोश और हिंसा की स्थिति

समाधान और रणनीतिक सुझाव

1. ABC + टीकाकरण नीति का कड़ाई से पालन
  • फीडिंग पॉइंट्स, स्टेरिलाइजेशन केंद्र और मानवीय ढंग से पकड़ने की प्रक्रिया को प्राथमिकता।
  • हर पकड़े गए कुत्ते का टैगिंग, इलाज और उसी क्षेत्र में पुनःस्थापन।
2. जन-जागरूकता और IEC अभियान
  • नवंबर से जून तक डॉग-बाइट की उच्चतम प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए वार्ड, स्कूल और पंचायत स्तर पर सूचना अभियान।
  • स्थानीय भाषा में पोस्टर, रेडियो और सोशल मीडिया का इस्तेमाल।
3. डिजिटल निगरानी और पारदर्शिता
  • पशु चिकित्सालयों और वैक्सीनेशन क्लिनिक को ऑनलाइन रिपोर्टिंग से जोड़ना।
  • जिला स्तर पर मासिक समीक्षा बैठकें आयोजित करना।
4. प्रशासनिक जवाबदेही और भागीदारी
  • नियमों का उल्लंघन करने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए।
  • NGO व स्थानीय संगठनों को निगरानी समितियों में शामिल किया जाए।
5. मानव–पशु सह-अस्तित्व को बढ़ावा
  • नरसंहार नहीं, टीकाकरण + स्टेरिलाइजेशन + पुनर्स्थापन ही समाधान।
  • समाज में करुणा और विज्ञान आधारित नीति के प्रति विश्वास जाग्रत करना।

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