देश/विदेश/सर्वोदय न्यूज़:- नेपाल की ही तरह अब फिलीपींस में हंगामा शुरू हो गया है। घटना भी लगभग वही पुराना सा ही लग रहा है। जैसा भारत के पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी के नौजवान भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।
आपको बतादें कि वैसा ही कुछ नजारा फिलीपींस में भी दिखाई दिया है । सोचने कि बात यह है कि, बाढ़ रोकने के नाम पर 9.5 अरब डॉलर उड़ जाएं, तो जनता क्या करेगी? हर मानसून में देश तबाह हो जाता है। जहा एक तरफ अस्पतालों में किल्लत देखने को मिलती है वही दूसरी तरफ स्कूल के बच्चे डूबती सड़कों से होकर गुजरते हैं, जबकि ठेकेदारों की लग्जरी गाड़ियों का काफिला सड़कों पर दौड़ता नजर आती है । राष्ट्रपति मार्कोस ने इस बात को खुद स्वीकारा है कि अधिकांश परियोजनाओं में अनियमितताएं हैं।
आपको बतादे कि , सरकारें जब सत्ता हाशिल करती है तो सुधारों के लुभावने वादे बांटती हैं, फिर घोटाले फूट पड़ते हैं, जनता सड़कों पर उतर आती है और सरकारें ढह जाती हैं। दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में यह कहानी पहले भी दोहराई जा चुकी है। फिलीपींस में भी यही दृश्य दोहराया जा रहा है! रविवार को शुरू हुए विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे, लेकिन ज्यादा देर न टिक सके और जल्द ही हिंसा भड़क उठी। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भिड़ंत हो गई। वाटर कैनन का सहारा लिया गया। पत्थरबाजी हुई, बोतलें फेंकी गईं। सड़कों पर टायर जलाए गए। दर्जनों लोग हिरासत में लिए गए, कई पुलिसकर्मी जख्मी भी हो गए।
प्रदर्शनकारियों ने तारीख का चुनाव बिल्कुल सटीक किया। 21 सितंबर को ही 1972 में तत्कालीन राष्ट्रपति मार्कोस सीनियर ने देश में मार्शल लॉ लागू किया था। इसी दिन को चिह्नित करते हुए लगभग 50,000 प्रदर्शनकारी लुनेटा पार्क में इकट्ठा हुए और सरकार विरोधी नारे लगाए। प्रदर्शन का नेतृत्व छात्रों, युवा पेशेवरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया।
यह आंदोलन थाईलैंड, हॉन्गकॉन्ग और यूरोपीय देशों में हाल ही में हुए जन आंदोलनों की तरह सोशल मीडिया के जरिए तेज़ी से फैला और वैश्विक नागरिक जागरूकता की एक कड़ी के रूप में सामने आया। प्रमुख मांगें क्या हैं?
प्रदर्शनकारियों ने सरकार के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखी हैं:
- भ्रष्ट अधिकारियों को तत्काल दंडित किया जाए।
- भ्रष्टाचार पर सख्त नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।
- नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए।
क्या विदेशी साजिश का हाथ है?
अब सवाल यह उठता है कि क्या इसमें बाहरी ताकतों की साजिश है? बड़ी शक्तियां मनीला पर नजरें गड़ाए हुए हैं। फिलीपींस प्रशांत महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मोहरा है। अमेरिका, चीन और पड़ोसी देश सब दांव पर लगे हैं। अस्थिरता संतुलन बिगाड़ सकती है। लेकिन इन प्रदर्शनों को लेकर कोई भ्रम न पालें। इनकी जड़ फिलीपीनी जनता का अपना गुस्सा है। आम लोग ठगे महसूस कर रहे हैं। वे टैक्स देते हैं, बाढ़ में घर गंवा देते हैं, और अमीरों को और अमीर होते देखते हैं। वहीं, राष्ट्रपति मार्कोस जूनियर का कहना है कि वे प्रदर्शनकारियों से नाराज नहीं हैं। वे शांति की अपील कर रहे हैं।
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