न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- खरमास शुरू होने से पहले भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर एक के बाद एक तीन अहम फैसले लेकर सियासी हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पहले उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, इसके बाद नितिन नबीन को कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई और अब बिहार भाजपा की कमान संजय सरावगी को दे दी गई है। इन फैसलों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा अब ओबीसी संतुलन के साथ-साथ अपनी कोर सपोर्टर कही जाने वाली जातियों पर भी फोकस बढ़ा रही है।
यूपी में पंकज चौधरी को आगे कर भाजपा ने कुर्मी वोट बैंक को साधने की कोशिश की है, लेकिन बिहार में पार्टी की रणनीति कुछ अलग नजर आ रही है। सरकार गठन के दौरान जहां ओबीसी वर्ग को प्रमुखता दी गई थी, वहीं अब संगठन में उन समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, जिन्हें भाजपा का परंपरागत समर्थक माना जाता है।
सबसे पहले कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नबीन को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी मिली। बिहार में कायस्थों की आबादी एक फीसदी से भी कम है, इसके बावजूद इसे अगड़ा समाज के लिए बड़ी राजनीतिक सौगात माना जा रहा है। इसी तरह मारवाड़ी समुदाय से आने वाले संजय सरावगी को बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। बिहार में मारवाड़ी समाज की संख्या भी सीमित है, लेकिन दोनों ही वर्ग भाजपा के भरोसेमंद वोटर माने जाते हैं।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए भाजपा उस आरोप की काट कर रही है, जिसमें कहा जा रहा था कि पिछड़े वर्गों को साधने के चक्कर में पार्टी अपने कोर वोटर समुदायों को नजरअंदाज कर रही है। साथ ही, यह कदम बिहार जैसे राज्य में जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति से बचने की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
बिहार की राजनीति में यादव, कुर्मी, पासवान, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जैसी जातियों के इर्द-गिर्द लंबे समय से ध्रुवीकरण होता रहा है। किसी एक बड़े सामाजिक समूह से नेतृत्व सामने आने पर अन्य वर्गों में असंतुलन की स्थिति बन जाती है। ऐसे में भाजपा ने उन समुदायों के नेताओं को आगे किया है, जिनके नाम पर जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति आसान नहीं है। साथ ही, पार्टी ने ऐसे चेहरों को चुना है, जिन्हें सर्वस्वीकार्य और मृदुभाषी माना जाता है।
पीएम मोदी के ‘चार जातियों’ के संदेश से जुड़ा फैसला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार देश में ‘चार जातियों’—युवा, महिला, किसान और गरीब—की बात करते रहे हैं। माना जा रहा है कि नितिन नबीन जैसे अपेक्षाकृत युवा नेता को आगे बढ़ाकर भाजपा जातीय राजनीति से ऊपर उठकर इसी सोच को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रही है। महज 45 साल के नितिन नबीन को नई पीढ़ी की उम्मीद और भविष्य के नेतृत्व के तौर पर देखा जा रहा है।
अब इन फैसलों का असर बिहार से लेकर दिल्ली तक पार्टी की राजनीति पर क्या पड़ता है, यह आने वाले दिनों में और साफ होगा।



