न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया सोनागाछी की सैकड़ों सेक्स वर्कर्स मंगलवार को निर्वाचन आयोग के विशेष सहायता शिविरों में पहुंचीं। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान उनके चेहरे पर मतदाता सूची से नाम हटने की आशंका साफ दिखाई दी। कई महिलाओं के पास माता-पिता का कोई रिकॉर्ड नहीं है—कई बचपन में तस्करी का शिकार हुईं, तो कई परित्यक्त होने के कारण पारिवारिक संपर्क खो चुकी हैं।
30 वर्षीय एक महिला ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “हमसे उन माता-पिता के बारे में पूछा जा रहा है जिन्हें हमें भूल जाने को मजबूर किया गया था। डर है कि हमें फिर मिटा दिया जाएगा।”
चुनाव आयुक्त का आश्वासन
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) मनोज अग्रवाल ने शिविर का निरीक्षण कर सेक्स वर्कर्स की आशंकाएं दूर करने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि इस वार्ड के लगभग 11,000 मतदाताओं में 3,500 सेक्स वर्कर्स अभी तक सर्वे में शामिल नहीं हो पाई हैं, जिन्हें जल्द ही जोड़ा जाएगा।
CEO ने कहा: “हमें विशेष अधिकार दिए गए हैं कि वे महिलाएं भी शामिल की जाएं जो 2002 की मतदाता सूची में नहीं थीं, लेकिन 2021 और 2024 में मतदान कर चुकी हैं। उनके नाम 11 दिसंबर तक सुरक्षित कर लिए जाएंगे।”
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि जिनके पास नागरिकता के अन्य प्रमाण उपलब्ध हैं, वे 16 दिसंबर से फॉर्म-6 जमा कर सकेंगी। अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
“रिश्तेदारों के दस्तावेज न होने पर भी घबराने की जरूरत नहीं” – CEO
मनोज अग्रवाल ने साफ किया कि जिन महिलाओं के पास पारिवारिक दस्तावेज नहीं हैं, उनके सत्यापन में स्थानीय लोग और पंजीकृत NGOs मदद करेंगे।
उन्होंने कहा कि बुजुर्गों के लिए लगने वाले विशेष कैंप की तरह, यहां भी अधिकारी और NGO प्रतिनिधि फॉर्म भरवाने और जरूरी दस्तावेज जुटाने में सहयोग करेंगे, ताकि कोई भी योग्य मतदाता सूची से बाहर न रह जाए।
निरीक्षण के दौरान CEO ने कई महिलाओं से बातचीत की। एक नवजात को गोद में लिए एक युवती ने बताया कि उसे चार साल पहले दक्षिण बंगाल के एक जिले से तस्करी कर यहां लाया गया था। उसने कहा—“मुझे नहीं पता मेरे माता-पिता कहां हैं। मेरे पास सिर्फ मेरी बेटी है।”
इस पर CEO ने उसे आश्वस्त किया, “चिंता न करें, आपका नाम सूची में बरकरार रहेगा।”
“तकनीकी कारणों से वोट नहीं छीना जा सकता”—शशि पांजा
इससे पहले महिला एवं बाल विकास मंत्री शशि पांजा ने सोनागाछी का दौरा करते हुए कहा कि राज्य सरकार सुनिश्चित करेगी कि वंचित वर्ग की कोई भी पात्र महिला अपने मताधिकार से वंचित न हो।उन्होंने कहा, “ये महिलाएं भारत की नागरिक हैं। तकनीकी कारणों से उनका वोट नहीं हटाया जा सकता।”
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उधर 30 वर्षीय एक महिला ने कहा,“हमसे उन माता-पिता के बारे में पूछा जा रहा है जो हमें भूल जाने को कहकर मिटा दिए गए थे। अब डर है कि हमें फिर से मिटा दिया जाएगा।”
पुराने दर्द फिर ताज़ा
47 वर्षीय पूजा दास के लिए यह प्रक्रिया पुराने घावों को कुरेदने जैसा साबित हो रही है। 20 साल की उम्र में उन्हें नादिया जिले से नौकरी का झांसा देकर लाया गया था और तब से वे अपने घर नहीं लौट सकीं।
उन्होंने कहा- “मैंने यहीं अपने बच्चों को जन्म दिया और पाला। अब मुझसे पूछा जा रहा है कि मेरे माता-पिता कौन हैं और 2002 में मैं कहां थी। मेरे लिए यह SIR कोविड जितना बड़ा संकट है—उस समय भूख थी, अब डर है।”
सोनागाछी की एक कोठी में पली-बढ़ी 40 साल की एक महिला ने फॉर्म को देखकर कहा, “मुझे अपना असली नाम तक याद नहीं। बचपन से जिस औरत ने पाला, उसी को मां बुलाती आई हूं। अगर असली परिवार ने मुझे त्याग दिया, तो यहां क्या लिखूं?”
वहीं, 51 वर्षीय कोहिनूर बेगम बोलीं- “यहां हर घंटा कमाई का होता है। लोकतंत्र जरूरी है, लेकिन आज रात का खाना भी उतना ही जरूरी है। अगर काम न करूं तो कौन खिलाएगा?”



