न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय संघ के वरिष्ठ प्रचारक और विहिप के कर्ताधर्ता के रूप में राम मंदिर आंदोलन से लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी विवाद की पैरवी कर मामले को सफलता की दहलीज पर पहुंचाने वाले की विदाई के पीछे उनका व्यक्तिगत आग्रह ही मुख्य वजह बन गया। राम मंदिर में सबसे पहला और बड़ा विवाद शुरुआती दौर में जमीन की खरीद फरोख्त को लेकर उठा था। उस घटना से सबक लिया गया होता तो शायद यह दिन नहीं देखना पड़ता। हालांकि उनके पास राम मंदिर चढ़ावे की चोरी प्रकरण में एक मौका था लेकिन त्वरित निर्णय नहीं ले पाने की वजह से विपक्ष को मुद्दा मिल गया। आरोप -प्रत्यारोप से असहज हुई केंद्र व प्रदेश सरकारों ने जब हस्तक्षेप किया तो एसआईटी गठित करने का पत्र भेजा गया।
दोषियों को बचाने का आरोप
चंपत राय पर दोषियों को बचाने का सीधा आरोप लगाया जाने लगा है। आरोप तब अधिक गंभीर हो गया, जब आरोपियों के पास तक़रीबन 80 लाख रुपए की बरामदगी हो गयी। इसके बावजूद भी कोई एफआईआर नहीं दर्ज कराई गयी। उल्टा उन्होंने अपने बयान में कहा कि आंतरिक आडिट हो रहा है और कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई। उनके बयान व आरोपियों के पास चोरी की बड़ी रकम का बरामद होने के बाद उनके ऊपर नैतिक जिम्मेदारी लेकर त्याग पत्र देने अथवा विधिक कार्रवाई का सामना करने के दो ही विकल्प रह गये थे।
संगठन और सरकार में बैठे शुभचिंतकों की सलाह पर उन्होंने फिलहाल पहले विकल्प को चुना और अपना त्यागपत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद देव गिरि के पास भेज दिया।
जमीनों की खरीदी से ही विवाद की शुरुआत
पहला विवाद तब हुआ जब ट्रस्ट ने वर्ष 2020 में कई जमीनें खरीदी। इनमें से कुछ खरीद-फरोख्त पर गंभीर आरोप लगे थे। एक मामले में दो करोड़ रुपये की जमीन 18 करोड़ रुपये में खरीदने का आरोप था। यह जमीन पहले एक किसान से खरीदी गई, फिर पांच मिनट में ट्रस्ट को बेची गई। दूसरे मामले में 20 लाख रुपये की जमीन ढाई करोड़ रुपये में खरीदने का आरोप था। विवाद बढ़ने पर शासन ने राधेश्याम मिश्रा जांच कमेटी बनाई थी। इसका उद्देश्य सभी तथ्यों को सामने लाना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। एसआईटी इन मामलों को अपनी जांच में शामिल कर सकती है।
संगठन पदाधिकारियों के बीच कार्य विभाजन
राम मंदिर ट्रस्ट महासचिव चंपत राय विहिप के सर्वेसर्वा के तौर पर निर्विवाद थे लेकिन राम मंदिर में उन्होंने सेवादार को अधिकार सम्पन्न बनाकर अपनों से ही दुश्मनी मोल ले ली। इसके कारण अंदरखाने उनके नेतृत्व को ही चुनौती मिलने लगी थी। फिलहाल राम मंदिर की व्यवस्था के तीन अलग अलग पदाधिकारियों के गुट के पक्ष में खींचतान जारी रही। यह अलग बात है कि तीनों एक साथ दिखाई देते जरूर थे, लेकिन उनमें आंतरिक दूरी बढ़ती जा रही थी। यही कारण था कि दूसरे ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र के खास सुभाष श्रीवास्तव को गणना प्रभारी, पास व्यवस्था का प्रभार आमंत्रित सदस्य गोपाल राव के खास सोमेश को सौंपकर संतुलन बनाने की कोशिश की गई थी।
राम मंदिर ट्रस्ट महासचिव चंपतराय के प्रतिनिधि के रूप में रामशंकर यादव टिन्नू की हनक के आगे शेष दोनों प्रतिनिधियों को विशेषाधिकार हासिल नहीं हो पाया। इसके चलते अंदरुनी गलतफहमी बढ़ती गयी और विरोध भी बढ़ता गया। जिसके बाद गुट के लोगों ने टिन्नू यादव का अधिपत्य को स्वीकार का स्वांग रचकर उसके साथ दोस्ती जोड़ ली फिर पहले उसकी कमजोरियां को जानीं और फिर उन्हीं कमजोरियों को उजागर कर हमला शुरू किया।
ट्रस्ट से जुड़ते ही अनिल मिश्र की दिखने लगी थी हनक
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सदस्य के रूप में डॉ. अनिल मिश्र का नाम शामिल होने के बाद राम जन्मभूमि परिसर में उनकी हनक दिखने लगी थी। उनके व्यवहार में बदलाव दिखने लगा। शुरुआत के दिनों में ही रामलला के अस्थाई मंदिर के पुजारियों से इनकी कहासुनी भी हुई, क्योंकि इन्होंने चरणामृत और प्रसाद बांटने में पाबंदी लगा दी थी। पहली बार वर्ष 2020 में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के क्लोन चेक द्वारा बैंक से छह लाख रुपए जालसाजों ने निकाल लिए थे, जिसमें महासचिव चंपत राय के प्रतिनिधि के तौर पर डॉ. अनिल मिश्र का साइन था। फ्रॉड के मामले में कोतवाली में चंपत राय ने केस दर्ज कराया था।
चर्चा में नाम आने के कारण साइन का पावर हटा दिया गया था, क्योंकि उस समय भी तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। संघ के सक्रिय कार्यकर्ता और चर्चित होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में डॉ. अनिल मिश्र की पहचान रही है। लेकिन श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सदस्य के रूप में नाम शामिल होने के बाद अनिल की ख्याति एकाएक कई गुना बढ़ गई। उनका हस्तक्षेप राम जन्मभूमि परिसर में बढ़ गया। अस्थाई मंदिर के पुजारी को वह दिशा-निर्देश जारी करने लगे।
उन्होंने पुजारी को निर्देश दिया कि वह श्रद्धालुओं को चरणामृत और प्रसाद नहीं देंगे। इसके बाद ट्रस्ट ने स्वयं इलायची दाना बनवाने के साथ वितरण शुरू कर दिया। इससे दर्जनों प्रसाद विक्रेताओं की रोजी-रोटी छीन गई। यहां भी दबी जुबान से आरोप लगा कि उन्होंने अपने खास व्यक्ति को इस कार्य में लगवा दिया। कुछ दिन बाद उन्होंने पुजारी को मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। अंदर ही अंदर पुजारी इनसे नाखुश रहने लगे। समय बीतता गया और स्थाई मंदिर बनने के बाद एक बार फिर जमीन खरीद फरोख्त में डॉ. अनिल मिश्र का नाम उछला। आरोप लगे कि मंदिर बनने के साथ आलीशान बिल्डिंग खड़ी कर ली, जिसमें लिफ्ट की व्यवस्था शामिल है।
खास लोगों को कर्मचारी बनाया, गुटबाजी का बने शिकार
राम मंदिर के सभी पूजा पाठ और धार्मिक आयोजनों में डॉ अनिल मिश्र और उनकी धर्मपत्नी प्रमुखता से शामिल हुईं। राम जन्मभूमि परिसर में महासचिव चंपत राय और डॉ अनिल मिश्र दो ही नाम प्रमुखता से जाने जाते रहे। हालांकि जमीन खरीद- फरोख्त का विवाद सामने आने के बाद गोपाल राव संघ के चेहरे के रूप में धीरे-धीरे प्रभावशाली दिखने लगे।
राम जन्मभूमि परिसर में तीन लोगों के बीच गुटबाजी शुरू हो गई। इसका फायदा बाहरी लोगों ने खूब उठाया। अपने लोगों की संख्या बढ़ाने के लिए तीन प्रमुख लोगों ने अपने लोगों को राम जन्मभूमि परिसर का कर्मचारी बना दिया। डॉ. अनिल मिश्र के ऊपर भी आरोप है कि उन्होंने कई करीबियों को परिसर के मुख्य जगहों पर स्थापित किया है।



