न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि संघ हमेशा से भारत के तिरंगे ध्वज का सम्मान करता आया है। उन्होंने बताया कि 1933 में जब पहली बार राष्ट्रीय ध्वज को लेकर चर्चा हुई, तब ध्वज समिति ने सर्वसम्मति से पारंपरिक भगवा रंग को स्वतंत्र भारत का झंडा बनाने की सिफारिश की थी, लेकिन महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद तीन रंगों वाला झंडा तय किया गया, जिसमें ऊपर भगवा रंग रखा गया।
भागवत ने कहा, “संघ अपनी स्थापना के बाद से ही तिरंगे के साथ खड़ा रहा है, उसका सम्मान किया है, श्रद्धांजलि अर्पित की है और उसकी रक्षा की है। इसलिए ‘भगवा बनाम तिरंगा’ जैसी कोई बात ही नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा कि जैसे कम्युनिस्ट पार्टी का लाल झंडा होता है, कांग्रेस का चरखे वाला तिरंगा और रिपब्लिकन पार्टी का नीला झंडा, वैसे ही संघ का अपना भगवा ध्वज है। लेकिन आरएसएस के लिए राष्ट्रीय ध्वज सर्वोच्च है और उसका हमेशा आदर किया जाएगा।
संघ स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यान श्रृंखला के दौरान भागवत ने यह बातें कहीं।
कांग्रेस नेताओं द्वारा आरएसएस पर “बिना पंजीकरण के काम करने” के आरोपों पर निशाना साधते हुए भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ को व्यक्तियों के निकाय (association of individuals) के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कहा, “आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी, उस समय क्या आप उम्मीद करते हैं कि हम ब्रिटिश सरकार से पंजीकरण कराते? आजादी के बाद भी भारत सरकार ने ऐसा अनिवार्य नहीं किया।”
उन्होंने बताया कि आयकर विभाग और अदालतों ने भी आरएसएस को मान्यता प्राप्त संगठन माना है, जिसे आयकर से छूट प्राप्त है। भागवत ने कहा, “हमें तीन बार प्रतिबंधित किया गया। अगर हमारा अस्तित्व नहीं था, तो सरकार ने किस पर प्रतिबंध लगाया?”



