लखनऊ/सर्वोदय न्यूज़:-मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान से जुड़े लंबे समय से विवादित विधेयक को आखिरकार वापस ले लिया गया है। राज्य कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह विधेयक वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी सरकार के दौरान लाया गया था, लेकिन कभी लागू नहीं हो सका।
दरअसल, उत्तर प्रदेश मदरसा (अध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) विधेयक, 2016 को उस समय विधानसभा और विधान परिषद दोनों से पारित किया गया था, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल राम नाइक ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलने के कारण यह कानून लागू नहीं हो पाया।
क्या था विवाद की वजह?
सपा सरकार के कार्यकाल में मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए ऐसे प्रावधान किए गए थे, जो अन्य शैक्षणिक विभागों से बिल्कुल अलग थे। इस विधेयक के तहत मदरसों के शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ न तो विभागीय जांच संभव थी और न ही पुलिस कोई कार्रवाई कर सकती थी।
यह भी पढ़े:- 2026 में बदलेगा राज्यसभा का समीकरण, 75 सीटों पर चुनाव; कौन पड़ेगा भारी?
इसके अलावा, वेतन भुगतान में देरी होने पर अधिकारियों पर दंड का प्रावधान था, जबकि बेसिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग के शिक्षकों को ऐसी विशेष सुविधा नहीं दी गई थी। यही वजह रही कि इस विधेयक को लेकर संवैधानिक आपत्तियां उठीं।
अब क्या बदलेगा?
विधेयक के वापस लिए जाने के बाद अब मदरसा शिक्षक या कर्मचारी यदि किसी तरह की गड़बड़ी या नियम उल्लंघन करते हैं, तो उनके खिलाफ पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाई संभव होगी। सरकार का मानना है कि इससे व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और कानून का समान रूप से पालन हो सकेगा।
मंत्री ओम प्रकाश राजभर का बयान
अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि यह विधेयक संविधान की भावना के विपरीत था। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी वर्ग के लिए अलग और विशेष कानून बनाना उचित नहीं है। अब सभी शिक्षकों और कर्मचारियों पर समान नियम लागू होंगे।



