न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने बिना ठोस कारण बताए एक व्यक्ति की गिरफ्तारी को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इसे अवैध मानते हुए राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है और पीड़ित को चार सप्ताह के भीतर मुआवजा देने का आदेश दिया है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार इस राशि की वसूली संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से कर सकती है। साथ ही, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को तुरंत रिहा करने के निर्देश दिए गए हैं।
खंडपीठ ने सुनाया फैसला
यह आदेश न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनाया। मामला मनोज कुमार की ओर से उनके पुत्र मुदित कुमार द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा था।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के गृह विभाग पर भी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि अपर मुख्य सचिव (गृह) अपने शपथ पत्र में यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि व्यक्ति को तीन महीने तक अवैध हिरासत में क्यों रखा गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब शीर्ष अधिकारी ही स्पष्ट जवाब नहीं दे पा रहे हैं, तो अन्य अधिकारियों की कार्यशैली का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार, मनोज कुमार को 27 जनवरी 2026 को उन्नाव जिले के आसीवन थाने में दर्ज एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि गिरफ्तारी के समय उन्हें कारण नहीं बताया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के कारणों को लिखित रूप में बताना अनिवार्य है। यह नागरिक के मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।
अवैध ठहराई गिरफ्तारी
हाईकोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। इसी कारण मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया रिमांड आदेश भी अवैध आधार पर टिका हुआ था। अदालत ने कहा कि व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय तक जेल में रखना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है।