नई दिल्ली/सर्वोदय न्यूज़:- जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक (Satyapal Malik) का मंगलवार को निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में मंगलवार दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर अंतिम सांस ली। वह बीते कुछ समय से दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती थे और गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे। अस्पताल में इलाज के दौरान ही उन्होंने अंतिम सांस ली। सत्यपाल मलिक 77 वर्ष के थे और हाल के वर्षों में अपने बेबाक बयानों और केंद्र सरकार की नीतियों के मुखर विरोध के चलते लगातार सुर्खियों में बने हुए थे।
छात्र नेता से राज्यपाल तक का सफर
सत्यपाल मलिक का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर राज्यपाल पद तक पहुंचा। उन्होंने 1970 के दशक में चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल से राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और 1974 में बागपत विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव जीतकर विधायक बने। अपने करियर में वह सांसद, केंद्रीय मंत्री, और राज्यपाल जैसे अहम पदों पर रहे।
पांच राज्यों के राज्यपाल रहे
वह 2017 से 2022 तक कुल 5 राज्यों – बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा, ओडिशा और मेघालय के राज्यपाल रहे। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल ऐतिहासिक रहा, जब अनुच्छेद 370 हटाया गया और राज्य का पुनर्गठन हुआ। इसी कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार के मुद्दों पर भी उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ बयान दिए, जिससे वे विवादों में घिर गए।
सत्यपाल मलिक किसान आंदोलन के दौरान सरकार के तीव्र आलोचक बनकर सामने आए। उन्होंने खुले मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों की आलोचना की और विवादित कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग की। वह खुद को चौधरी चरण सिंह का अनुयायी बताते थे और कई राज्यों में किसान रैलियों को संबोधित किया।
अपने कार्यकाल के दौरान हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के बाद उनके खिलाफ ही CBI ने चार्जशीट दाखिल की थी। अस्पताल में भर्ती रहते हुए भी उन्होंने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा, “जो व्यक्ति भ्रष्टाचार उजागर करे, उसी पर केस दर्ज कर दिया जाए, यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।”
एक्स (Twitter) से मिली निधन की पुष्टि
उनके निधन की आधिकारिक जानकारी उनके एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट से साझा की गई। यह वही अकाउंट है जहां 9 जुलाई 2025 को उनके निजी सहायक ने उनकी गंभीर हालत की जानकारी दी थी।
सत्यपाल मलिक भारतीय राजनीति के उन नेताओं में शामिल थे, जो सत्ता में रहते हुए भी बोलने से नहीं डरते थे। उनके निधन से भारतीय राजनीति ने एक स्वतंत्र विचारधारा वाले नेता को खो दिया है।



