न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने हाल ही में अपने प्रवचन में भक्ति और नाम जप को लेकर महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं। उन्होंने बताया कि भक्ति का असली स्थान केवल मंदिर या किसी विशेष जगह तक सीमित नहीं है, बल्कि सच्ची भक्ति तो निरंतर भगवान के स्मरण में है।
भक्ति का सर्वोत्तम स्थान
एक श्रद्धालु ने महाराज से पूछा कि भक्ति करने के लिए सबसे सही जगह कौन सी है। इस पर प्रेमानंद महाराज ने कहा:
“नाम जप, अखंड स्मृति और भगवान का सतत स्मरण—यही भक्ति का असली स्वरूप है। हमारे सारे आचरण भगवान को अर्पित हों और मन निरंतर उनके नाम में लगा रहे। यही सर्वोत्तम भक्ति का स्थान है।”
उन्होंने आगे बताया कि जब व्यक्ति भगवान का नाम जप करने लगे और उनका विस्मरण होने पर मन व्याकुल हो, जैसे मछली पानी से बाहर तड़पती है, तो समझ जाए कि भक्ति का प्रभाव अब रंग ला रहा है।
नाम जप में रुचि कैसे उत्पन्न होगी
प्रेमानंद महाराज ने नाम जप के महत्व को बताते हुए कहा कि रोज संतों के भजन सुनना और भगवान की महिमा का श्रवण करना रुचि पैदा करने का सबसे सरल तरीका है। यदि आप सीधे सुनने नहीं आ सकते हैं तो मोबाइल या अन्य डिजिटल माध्यम से सुन सकते हैं।
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महाराज ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे हम सड़क पर 5 रुपये के नोट को देखकर रुकते नहीं हैं लेकिन 500 रुपये के नोट को देखकर तुरंत ध्यान लगाते हैं, वैसे ही भगवान के नाम को हमारी महातबुद्धि और इच्छा में स्थान देना चाहिए।
उनके अनुसार: भगवान के नाम से बड़ा कोई बल नहीं है। कोई ज्ञान, संपत्ति या साधना उनके नाम के बराबर नहीं है। भक्ति का मूल आधार केवल भगवान का नाम है, खुद भगवान दूसरे नंबर पर हैं।
इस तरह संतों की वाणी सुनना और नाम जप का अभ्यास करना ही सच्ची भक्ति और उद्धार का मार्ग है।



