Friday, February 13, 2026

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अक्षय नवमी की शुरुआत कैसे हुई? जानिए किसने की थी पहली पूजा और क्यों पूजनीय है आंवला वृक्ष

न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अक्षय नवमी कहा जाता है। यह तिथि धार्मिक, पौराणिक और आयुर्वेदिक — तीनों दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
इस दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है, जिसे “अक्षय फल” और आरोग्य का प्रतीक कहा गया है। आयुर्वेद में आंवला को त्रिफला जैसी औषधियों का आधार और श्रेष्ठ औषधीय फल बताया गया है।

आंवला — अमृत का वरदान

पद्म पुराण के अनुसार, सागर मंथन के समय जब विष की बूंदें गिरीं, तब गर्म प्रकृति वाली औषधियों की उत्पत्ति हुई। वहीं अमृत की बूंदों से ठंडक देने वाली, पुष्टिवर्धक वनस्पतियां उत्पन्न हुईं — जिनमें आंवला प्रमुख है।

आंवला हर रूप में लाभकारी माना गया है — फल के रूप में सेवन करने पर यह शरीर को शीतलता देता है। मुरब्बा, अचार या चटनी के रूप में यह स्वाद और स्वास्थ्य दोनों बढ़ाता है। सुखाकर या चूर्ण बनाकर रखने पर यह दीर्घकालिक औषधि बन जाता है। त्रिफला नामक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक औषधि में आंवला प्रमुख घटक है। इस कारण इसे “औषधियों का राजा” कहा गया है।

नवमी तिथि — पूर्णता और अक्षयता का प्रतीक

अंकों के अनुसार ‘9’ पूर्णता का प्रतीक है। इसलिए शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को ‘अक्षय नवमी’ कहा जाता है — यानी ऐसी तिथि, जो अविनाशी पुण्य और अक्षय फल प्रदान करती है।

देवी लक्ष्मी और अक्षय नवमी की कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं। उन्होंने देखा कि कई धर्मपरायण लोग भी दुख झेल रहे हैं।
उन्होंने सोचा — ऐसा क्या उपाय हो जिससे लोगों को कभी समाप्त न होने वाला पुण्य (अक्षय फल) प्राप्त हो सके?

इसी दौरान देवर्षि नारद प्रकट हुए और उन्होंने देवी लक्ष्मी से कहा — “यदि भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा एक साथ की जाए, तो अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।” लेकिन समस्या थी कि विष्णुजी को तुलसी पत्र, और शिवजी को बेलपत्र प्रिय हैं। दोनों की पूजा एक साथ कैसे हो?

तुलसी और बेल — दोनों के गुण आंवले में

देवी लक्ष्मी ने इसका समाधान आंवले के वृक्ष में देखा। आंवले में तुलसी और बेल दोनों के गुण पाए जाते हैं। यह ठंडक भी देता है और संतुलन भी बनाए रखता है। इसलिए कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन देवी लक्ष्मी ने आंवला वृक्ष की पूजा की।

तब भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों प्रकट हुए और उन्होंने कहा कि“जो कोई इस दिन आंवले की पूजा करेगा, वह हमारी दोनों की कृपा का पात्र बनेगा।”

आंवले की पूजा का धार्मिक महत्व

आंवले के फल को ब्रह्मा, तने को विष्णु, और जड़ों को शिव का स्वरूप माना गया है।इसलिए इसे “अक्षय भंडार का प्रतीक” कहा जाता है। आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने की परंपरा भी इसी मान्यता से जुड़ी है — क्योंकि यह वृक्ष वातावरण को शुद्ध करता है और भोजन को पोषण एवं आरोग्य प्रदान करता है।

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