न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का 25वां शिखर सम्मेलन 31 अगस्त से 1 सितंबर 2024 तक चीन के तियानजिन शहर में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सहित 20 से अधिक देशों के नेता भाग लेंगे। यह सम्मेलन एससीओ का अब तक का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन होगा, जिसमें वैश्विक दक्षिण को एकजुट करने और अमेरिका के प्रभाव को संतुलित करने के लिए कूटनीतिक कदम उठाए जाएंगे।
कौन-कौन शामिल हो रहे हैं इस ऐतिहासिक सम्मेलन में?
इस शिखर सम्मेलन में निम्नलिखित प्रमुख नेता और संगठन शामिल हो रहे हैं:
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (भारत)
- राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (रूस)
- राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (ईरान)
- प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (पाकिस्तान)
- राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको (बेलारूस)
- राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायव (कजाकिस्तान)
- राष्ट्रपति शव्कत मिर्ज़ियोयेव (उज्बेकिस्तान)
- राष्ट्रपति सादिर जपारोव (किर्गिस्तान)
- राष्ट्रपति इमोमाली रहमोन (ताजिकिस्तान)
इसके अलावा, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन, म्यांमार के सैन्य प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग, नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम भी इस सम्मेलन में भाग लेंगे।
एससीओ का वैश्विक महत्व और अमेरिका के लिए चुनौती
एससीओ की शुरुआत 1996 में “शंघाई फाइव” के रूप में हुई थी, जिसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, और ताजिकिस्तान शामिल थे। 2001 में उज्बेकिस्तान का सदस्य बनना और 2017 में भारत तथा पाकिस्तान का जुड़ना एससीओ के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। वर्तमान में, एससीओ दुनिया की 43% आबादी और 23% वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
चीन के लिए यह सम्मेलन एक बड़ा कूटनीतिक मंच साबित हो सकता है, जहां वह ग्लोबल साउथ को एकजुट कर पश्चिमी प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश करेगा।
एससीओ में संघर्ष और अमेरिका की चिंताएं
एससीओ के सदस्यों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, जिनमें रूस-यूक्रेन युद्ध, भारत-पाकिस्तान तनाव, और इजरायल-गाजा संघर्ष शामिल हैं। खासकर भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले विवादों ने संगठन में तनाव बढ़ाया है। इसके बावजूद, भारत और चीन के बीच नए समीकरण बन रहे हैं, खासकर अमेरिका द्वारा भारत पर टैरिफ बढ़ाने के बाद। इससे अमेरिका के लिए चिंता बढ़ गई है क्योंकि चीन और भारत के बीच संबंधों में सुधार हो रहा है।
अमेरिका के लिए क्या संभावित निहितार्थ हो सकते हैं?
चीन के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन सकती है। अमेरिका ने पहले ब्रिक्स जैसे ग्लोबल साउथ संगठनों पर “अमेरिका विरोधी” होने का आरोप लगाया है। भारत का चीन के साथ तालमेल बढ़ाना और 50% टैरिफ के बाद क्वाड देशों के साथ रिश्तों में तनाव बढ़ाना, अमेरिका के लिए एक नई चुनौती हो सकती है।
इस शिखर सम्मेलन के बाद, क्वाड (भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका) का सम्मेलन भी आयोजित होगा, जो चीन के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करेगा।
क्या उम्मीद की जा रही है इस सम्मेलन से?
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस सम्मेलन में “तियानजिन घोषणापत्र” जारी करेंगे, जिसमें एससीओ की आगामी रणनीतियों और विकास के पहलुओं पर चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, सम्मेलन में “शंघाई स्पिरिट” को बढ़ावा दिया जाएगा, जो आपसी विश्वास, समानता, और साझा विकास पर आधारित है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि संगठन में कुछ अंदरूनी मतभेदों के कारण ठोस परिणाम प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यह शिखर सम्मेलन ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक कूटनीतिक मंच के रूप में रूस और चीन की संज्ञात साझेदारी को प्रदर्शित करेगा।



