Wednesday, June 17, 2026

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‘अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं’ – उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जताई नाराजगी;

नई दिल्ली/सर्वोदय:- भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा है कि अदालतें भारत के राष्ट्रपति को निर्देश नहीं दे सकतीं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए न्यायपालिका को लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ ’24×7 उपलब्ध न्यूक्लियर मिसाइल’ तक करार दिया।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था जिसमें कहा गया कि राज्यपालों द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। इस फैसले के तहत कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति को पूर्ण वीटो या पॉकेट वीटो का अधिकार नहीं है और उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

उपराष्ट्रपति की आपत्ति

राज्यसभा के प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा: “हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते जहां अदालतें भारत के राष्ट्रपति को आदेश दें। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति सर्वोच्च संवैधानिक पद पर हैं, और उनके कार्यों में हस्तक्षेप लोकतंत्र के संतुलन को खतरे में डालता है।”

उन्होंने आगे कहा कि न्यायपालिका का कार्य संविधान की व्याख्या करना है, न कि कार्यपालिका और विधायिका के अधिकारों में दखल देना। उन्होंने अनुच्छेद 142 को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि इसका उपयोग अब लोकतांत्रिक संस्थाओं पर एकतरफा दबाव बनाने के लिए हो रहा है।

न्यायपालिका बन रही हैसुपर संसद’?

उपराष्ट्रपति ने कहा कि अगर न्यायपालिका कानून बनाएगी, कार्यपालिका के कार्य करेगी और संसद के ऊपर खड़ी होगी, तो यह संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा ढांचा भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

हाईकोर्ट जज के घर से जले हुए नोटों का मामला भी उठाया

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर से जले हुए नोटों के बंडल मिलने की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने पूछा कि इतनी बड़ी घटना सात दिनों तक छुपी कैसे रही? क्या यह देरी समझने या माफ करने योग्य है?

सुप्रीम कोर्ट का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अनुच्छेद 201 के तहत राज्यपालों की ओर से राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों पर अनिश्चितकालीन विलंब उचित नहीं है। अदालत ने साफ किया कि राष्ट्रपति को फैसले लेने में देरी नहीं करनी चाहिए और यह प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आ सकती है।

यह मामला भारत के लोकतांत्रिक तंत्र के तीन स्तंभों – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका – के बीच शक्ति-संतुलन के मुद्दे को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ चुका है। उपराष्ट्रपति का बयान यह दर्शाता है कि संविधान की व्याख्या और पालन को लेकर शीर्ष स्तर पर गहरे मतभेद उभर रहे हैं।

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