नई दिल्ली/लखनऊ/सर्वोदय न्यूज़:- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद सियासी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने केंद्र सरकार और यूजीसी पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि नए नियम लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लिया जाता और जांच समितियों में सवर्ण समाज को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाता, तो इस मुद्दे पर विवाद और सामाजिक तनाव पैदा नहीं होता।
मायावती ने कहा कि यूजीसी द्वारा सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में जातिवादी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से जो नए नियम बनाए गए हैं, उन्होंने देश में सामाजिक तनाव का माहौल बना दिया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाने का फैसला उचित है।
बसपा प्रमुख ने यह भी कहा कि अगर यूजीसी ने नियम लागू करने से पहले सभी वर्गों से संवाद किया होता और नेचुरल जस्टिस के तहत अपरकास्ट समाज को भी जांच समितियों में प्रतिनिधित्व दिया होता, तो इस तरह का बवाल खड़ा ही नहीं होता।
अखिलेश यादव ने भी फैसले का किया स्वागत
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि सच्चा न्याय वही है, जिसमें किसी पर अत्याचार या अन्याय न हो। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि कानून की भाषा और भावना दोनों स्पष्ट होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बात सिर्फ नियमों की नहीं, बल्कि नीयत की भी होती है।
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अखिलेश यादव ने कहा कि किसी का उत्पीड़न न हो, किसी के साथ अन्याय या जुल्म न हो—यही सच्चे न्याय की पहचान है और न्यायालय इसी सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर लगाई रोक
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के हालिया नियमों के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इन नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को गैर-समावेशी तरीके से तय किया है और कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया गया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया है। उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी संस्थानों में ‘समानता समितियां’ गठित करने से संबंधित ये नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे।



