न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- सनातन धर्म में बड़ों के पैर छूना सम्मान, संस्कार और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। बचपन से सिखाया जाता है कि बड़ों का आशीर्वाद लेना पुण्य का कार्य है। लेकिन कई बार यह सवाल उठता है कि क्या किसी के पैर छूने से हमारा पुण्य घट जाता है?
इस पर अब वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में विस्तार से जवाब दिया है।
पैर छूना — सम्मान या पुण्य का नाश?
हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान एक शिष्य ने प्रेमानंद महाराज से पूछा –“क्या किसी के पैर छूने से हमारा पुण्य समाप्त हो जाता है?”
इस पर संत प्रेमानंद महाराज ने कहा,“अगर पैर छुआने की हमारी इच्छा है, तो यह भजन और भक्ति के मार्ग में बाधा बन सकता है। लेकिन अगर हमारी कोई इच्छा नहीं है, और कोई व्यक्ति श्रद्धा से पैर छू लेता है, तो इससे पुण्य का नाश नहीं होता।” उन्होंने स्पष्ट किया कि पैर छूना और प्रणाम करना दोनों का उद्देश्य समान है – सम्मान और विनम्रता प्रकट करना।
प्रेमानंद महाराज ने दिया आध्यात्मिक तर्क
संत प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा, “लाखों लोग प्रणाम करते हैं, लेकिन हम उन सबमें भगवान को देखते हैं। अगर मन में यह भाव आ जाए कि ‘मैं श्रेष्ठ हूं’, तो भजन क्षीण हो जाता है। सोच और भाव ही असली कुंजी है। अगर सोच सही है, तो पुण्य नष्ट नहीं होगा।”
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उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति में भगवान का अंश है।“जब कोई श्रद्धा से आपके पैर छूता है, तो समझिए वह भगवान के प्रति श्रद्धा जता रहा है। हमें यह भाव रखना चाहिए कि हम इस योग्य नहीं हैं, और उसके प्रति विनम्रता दिखानी चाहिए।”
महाराज ने सलाह दी कि व्यक्ति को स्वयं यह कोशिश करनी चाहिए कि कोई उसके पैर न छुए, लेकिन यदि कोई फिर भी श्रद्धा से ऐसा करता है, तो भगवत भावना से उसे प्रणाम कर लेना चाहिए।
संस्कार और भावना का महत्व
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, पैर छूना केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक भावना है। जब यह भावना अहम् से नहीं, बल्कि भक्ति और विनम्रता से जुड़ी होती है, तभी इसका वास्तविक अर्थ पूरा होता है।



