न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- आज की दुनिया में “वन हेल्थ” की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक हो चुकी है। इसका मुख्य उद्देश्य है मनुष्य, पशु और पर्यावरण – तीनों के स्वास्थ्य को एक साझा दृष्टिकोण से देखना।डॉ. हेमंत कुमार (पशु चिकित्सक) और डॉ. प्रियांका (पशु चिकित्सक) के अनुसार-
“वन नेशन, वन हेल्थ” की अवधारणा, अंतर्राष्ट्रीय मॉडल पर आधारित है, जिसका उद्देश्य है – मनुष्य, पशु और पर्यावरण की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को एक साथ जोड़ना। इसका महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि हाल के वर्षों में दुनिया ने कोविड-19, एवियन इन्फ्लुएंजा, निपाह वायरस, लम्पी स्किन डिज़ीज़ और रेबीज़ जैसी बीमारियों से गंभीर अनुभव प्राप्त किया है।
भारत सरकार ने राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य मिशन (National One Health Mission, 2022) लॉन्च किया है, जिसमें वेटरनरी, पब्लिक हेल्थ, पर्यावरण और कृषि – चारों सेक्टर को एक प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ा गया है।

वर्तमान स्थिति और डेटा
WHO और FAO के अनुसार मानव में 60% से अधिक संक्रामक रोग ज़ूनोटिक (पशुओं से उत्पन्न) हैं। भारत में हर वर्ष लगभग 1.7 करोड़ डॉग बाइट के केस और करीब 20,000 मौतें रेबीज़ से होती हैं। राजस्थान और उत्तर भारत में लम्पी स्किन डिज़ीज़ से 2022–23 में लाखों पशुओं की मृत्यु हुई, जिससे दुग्ध उत्पादन और पशुपालन उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
कोविड-19 महामारी ने स्पष्ट कर दिया कि पशु जनित रोगों की अनदेखी मानव स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकती है।
“वन नेशन, वन हेल्थ” में वेटरनरी डॉक्टर की भूमिका
- ज़ूनोटिक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण
वेटरनरी डॉक्टर सीधे उन रोगों पर काम करते हैं जो पशुओं से मनुष्यों में फैलते हैं (रेबीज़, ब्रुसेलोसिस, टीबी, बर्ड फ्लू, लम्पी आदि)।समय पर निदान और टीकाकरण अभियान से महामारी फैलने से पहले ही नियंत्रण किया जा सकता है।
- एपिडेमियोलॉजिकल सर्विलांस (Epidemiological Surveillance)
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पशुओं के स्वास्थ्य पर नजर रखना। रोग रिपोर्टिंग सिस्टम (National Animal Disease Reporting System – NADRS) को सशक्त करना।
- भोजन एवं दुग्ध सुरक्षा (Food Safety)
दूध, मांस, अंडे जैसे उत्पादों में एंटीबायोटिक रेजिड्यू, माइक्रोबियल संक्रमण की जांच। फूड चेन को सुरक्षित बनाकर मानव स्वास्थ्य की रक्षा।
- पर्यावरणीय स्वास्थ्य (Environmental Health)
पशु अपशिष्ट प्रबंधन, बायो-मेडिकल वेस्ट, और प्रदूषण नियंत्रण में योगदान। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को रोकने के लिए रेशनल दवा उपयोग।
- अनुसंधान और नीति निर्माण
पशु चिकित्सक रिसर्च में योगदान कर नए वैक्सीन और डायग्नोस्टिक किट तैयार करते हैं।नीति निर्धारण में डेटा और रिसर्च आधारित सुझाव देकर सरकार को सहयोग।
- सामुदायिक शिक्षा और जागरूकता
ग्रामीण स्तर पर पशुपालकों को रोग रोकथाम, टीकाकरण, स्वच्छता और सही दवा उपयोग के बारे में मार्गदर्शन। स्कूल स्तर पर ज़ूनोटिक रोगों पर जागरूकता कार्यक्रम।
भविष्य में वेटरनरी क्षेत्र का योगदान
वन हेल्थ यूनिट्स की स्थापना – हर जिले में मेडिकल और वेटरनरी डॉक्टरों की संयुक्त टीम।डेटा इंटीग्रेशन – मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण स्वास्थ्य का एक साझा डेटाबेस।
वैक्सीन उत्पादन में आत्मनिर्भरता – जैसे लम्पी स्किन डिज़ीज़ के लिए हाल ही में भारत में विकसित “Lumpi-ProVacInd” वैक्सीन।
ग्लोबल कोलैबोरेशन – FAO, WHO, OIE जैसे संगठनों के साथ भारत के वेटरनरी विशेषज्ञ जुड़कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योगदान दे सकते हैं।
“वन नेशन, वन हेल्थ” केवल एक नीति नहीं बल्कि एक सामूहिक दृष्टिकोण है। इसमें वेटरनरी डॉक्टरों की भूमिका सबसे अहम है क्योंकि मानव स्वास्थ्य की जड़ पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी हुई है।
जैसा कि डॉ. हेमंत कुमार (पशु चिकित्सक) और डॉ. प्रियांका (पशु चिकित्सक) बताते हैं – “यदि पशु चिकित्सक, मानव चिकित्सक और पर्यावरण विशेषज्ञ मिलकर काम करें तो भारत न केवल रेबीज़ जैसे ज़ूनोटिक रोगों से मुक्त हो सकता है, बल्कि भविष्य की महामारी से भी सुरक्षित रह सकता है।”



