न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- जब भी मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है, पूरी दुनिया की नजरें ऊर्जा आपूर्ति पर टिक जाती हैं। ओमान और ईरान के बीच स्थित हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग माना जाता है। आम तौर पर माना जाता है कि यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा।
लेकिन हालिया घटनाक्रम ने एक अलग तस्वीर पेश की है। इस बार सबसे ज्यादा असर पेट्रोल या डीजल पर नहीं, बल्कि घरेलू रसोई में इस्तेमाल होने वाली एलपीजी गैस पर दिखाई दे रहा है। देश के कई शहरों—दिल्ली, नोएडा, मुंबई, बेंगलुरु और छोटे कस्बों—में गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। कई जगह रेस्टोरेंट और ढाबे गैस की कमी के कारण मेन्यू सीमित कर रहे हैं या अस्थायी रूप से बंद हो रहे हैं। वहीं कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतें ब्लैक मार्केट में हजारों रुपये तक पहुंचने की खबरें सामने आ रही हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पेट्रोल पंपों पर स्थिति सामान्य बनी हुई है। न तो लंबी कतारें हैं और न ही कीमतों में अचानक उछाल देखने को मिला है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि हॉर्मुज संकट का असर एलपीजी पर ही क्यों पड़ा?
हॉर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना अहम?
फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह लगभग 21 मील चौड़ा समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा ‘चोकपॉइंट्स’ में गिना जाता है। वैश्विक तेल और गैस व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
सऊदी अरब, कतर, यूएई, कुवैत और इराक जैसे बड़े ऊर्जा निर्यातक देशों की आपूर्ति इसी मार्ग पर निर्भर है। हालिया तनाव और सुरक्षा खतरे के कारण इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, जिससे ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया।
एलपीजी पर सबसे पहले क्यों पड़ा असर?
भारत में एलपीजी की मांग तेजी से बढ़ी है। देश में हर साल लगभग 3 करोड़ टन से अधिक एलपीजी की खपत होती है, लेकिन घरेलू उत्पादन इससे काफी कम है। शेष जरूरतें मुख्य रूप से खाड़ी देशों से आयात के जरिए पूरी की जाती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत आने वाली एलपीजी खेप का लगभग 80–90 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। ऐसे में जब इस मार्ग पर बाधा आई, तो एलपीजी टैंकरों की आपूर्ति प्रभावित हो गई और घरेलू बाजार में कमी दिखाई देने लगी।
एलपीजी के लिए सीमित भंडारण क्षमता
एलपीजी संकट की एक बड़ी वजह इसका सीमित भंडारण भी है। कच्चे तेल के विपरीत एलपीजी को तरल अवस्था में सुरक्षित रखने के लिए उच्च दबाव या बेहद कम तापमान वाले विशेष टैंकों की जरूरत होती है। यह व्यवस्था महंगी और तकनीकी रूप से जटिल होती है।
इसी कारण दुनिया के अधिकांश देशों की तरह भारत के पास भी एलपीजी का बड़ा रणनीतिक भंडार नहीं है। आपूर्ति बाधित होने पर इसका असर कुछ ही दिनों में उपभोक्ताओं तक पहुंच जाता है।
पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं हुए प्रभावित?
पेट्रोल और डीजल कच्चे तेल से तैयार होते हैं, और इस मामले में भारत ने पिछले वर्षों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है। भारत 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात करता है। हाल के समय में रूस प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जबकि इराक और सऊदी अरब भी बड़े स्रोत हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के करीब 70 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात ऐसे मार्गों से आता है जो हॉर्मुज से नहीं गुजरते। इसके अलावा देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी है, जिससे आपातकालीन स्थिति में कई हफ्तों तक जरूरत पूरी की जा सकती है।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का सहारा
भारत ने कच्चे तेल के लिए रणनीतिक भंडारण प्रणाली विकसित की है। विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर में भूमिगत चट्टानी गुफाओं में कच्चा तेल जमा रखा जाता है। रिफाइनरियों और तेल कंपनियों के वाणिज्यिक भंडार को मिलाकर देश के पास कई सप्ताह की मांग पूरी करने लायक तेल उपलब्ध रहता है।
एलपीजी के मामले में स्थिति कमजोर
एलपीजी के लिए भंडारण क्षमता बेहद सीमित है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास एलपीजी के भूमिगत भंडार की कुल क्षमता लगभग 1.4 लाख टन है, जो देश की खपत के हिसाब से दो दिन से भी कम की जरूरत पूरी कर सकती है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की गैस आपूर्ति व्यवस्था बड़े भंडारण के बजाय निरंतर आयात और वितरण प्रणाली पर आधारित है।
उज्ज्वला योजना से बढ़ी मांग
पिछले दशक में रसोई गैस की मांग तेजी से बढ़ी है। सरकारी योजनाओं के चलते एलपीजी कनेक्शन का विस्तार ग्रामीण इलाकों तक हुआ है।
2010 में जहां एलपीजी कनेक्शन लगभग 10.6 करोड़ थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर करीब 33 करोड़ तक पहुंच गई। लकड़ी और बायोमास से एलपीजी की ओर यह बदलाव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिहाज से सकारात्मक रहा है, लेकिन इससे देश की निर्भरता एलपीजी आपूर्ति पर काफी बढ़ गई है।
सरकार ने क्या किया? एलपीजी के लिए इमरजेंसी मोड
एलपीजी आपूर्ति को स्थिर करने के लिए सरकार और तेल कंपनियों ने कई कदम उठाए हैं। रिफाइनरियों को कच्चे तेल से एलपीजी की रिकवरी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल उद्योग में इस्तेमाल होने वाले प्रोपेन और ब्यूटेन को अस्थायी रूप से एलपीजी उत्पादन की ओर मोड़ा जा रहा है।
सरकार खाड़ी क्षेत्र के बाहर—जैसे अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका—से भी अतिरिक्त एलपीजी कार्गो मंगाने की कोशिश कर रही है। हालांकि इन शिपमेंट को भारत तक पहुंचने में अधिक समय लग सकता है और लागत भी ज्यादा हो सकती है।



