वृंदावन/सर्वोदय:– आज के समय में जब लोग आध्यात्मिक शांति और मानसिक सुकून की तलाश में हैं, तब वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज उन गिने-चुने संतों में शामिल हैं, जिनकी वाणी न केवल आध्यात्मिक ज्ञान से भरपूर होती है, बल्कि आम जीवन के छोटे-छोटे सवालों के भी गहरे और सरल उत्तर देती है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रेमानंद जी का एक वीडियो खासा वायरल हो रहा है, जिसमें एक भक्त ने उनसे सवाल किया – “महाराज, क्या नजर लगती है? क्या नजर उतारना सही है या ये सब केवल अंधविश्वास है?”
इस सवाल का जवाब प्रेमानंद जी महाराज ने बड़े ही सहज और सटीक अंदाज़ में दिया। उन्होंने कहा, “जब हमें कोई बहुत प्रिय होता है, तो हमारे मन में डर होता है कि कहीं उसके साथ कुछ गलत न हो जाए। यही डर हमें उसकी ‘नजर उतारने’ जैसे काम करने पर मजबूर करता है।”
उन्होंने इसे मां यशोदा की उस भावना से जोड़ा, जब वे श्रीकृष्ण की नजर उतारा करती थीं। प्रेमानंद जी ने कहा, “वो टोना-टोटका नहीं था, वो एक मां का अपने लाड़ले के लिए प्रेम था।”
महाराज जी का मानना है कि नजर जैसी कोई नकारात्मक शक्ति वास्तव में नहीं होती। यह केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया होती है – हमारा डर, हमारी चिंता और हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि हम सकारात्मक सोचें, प्रेम और विश्वास से भरे रहें, तो कोई भी नजर या बाहरी असर हमें छू नहीं सकता।
उन्होंने कहा, “जिस श्रीकृष्ण की नजर से यह संसार चलता है, उन्हें कोई नजर कैसे लग सकती है?” यह वाक्य श्रोताओं के दिलों को छू गया।
अंधविश्वास नहीं, आत्मविश्वास जरूरी है
प्रेमानंद जी महाराज ने यह भी स्पष्ट किया कि नजर उतारना कोई समाधान नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक सहारा है, जिससे हमें अस्थायी सुकून मिलता है। लेकिन असली समाधान हमारे विचारों की शुद्धता और सोच की शक्ति में है।
उनके अनुसार, पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा यह भ्रम कि नजर लगती है, वैज्ञानिक या तार्किक आधार पर सही नहीं ठहरता। इसके बजाय हमें अपने मन को सकारात्मक ऊर्जा से भरना चाहिए।



