Budget 2026 | Chabahar Port: केंद्रीय बजट 2026-27 में जहां कई अहम क्षेत्रों के लिए बड़े ऐलान किए गए, वहीं चाबहार बंदरगाह परियोजना पूरी तरह नदारद रही। पहली बार ऐसा हुआ है जब इस रणनीतिक प्रोजेक्ट के लिए बजट में कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत ने अमेरिकी दबाव और संभावित प्रतिबंधों के चलते चाबहार को लेकर अपनी रणनीति बदल दी है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत इस परियोजना पर हर साल करीब 100 करोड़ रुपये खर्च कर रहा था। भारत, ईरान के साथ मिलकर चाबहार बंदरगाह का विकास कर रहा है, जिसे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापार के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।
अमेरिकी प्रतिबंध और ट्रंप की चेतावनी
सितंबर 2025 में अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, हालांकि चाबहार परियोजना को लेकर भारत को छह महीने की छूट (वेवर) दी गई थी। यह छूट 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रही है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में कहा था कि भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है।
इसी बीच, ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। माना जा रहा है कि इसी दबाव के बीच भारत ने बजट में चाबहार के लिए फंडिंग रोकने का फैसला लिया है।
क्या भारत पीछे हट रहा है?
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत इस परियोजना से पूरी तरह पीछे हट चुका है और उसने ईरान को अपनी प्रतिबद्ध 120 मिलियन डॉलर की राशि हस्तांतरित कर दी है। हालांकि भारत सरकार ने इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
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रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी नियमों के उल्लंघन से बचने के लिए भारत अब चाबहार परियोजना का संचालन स्थानीय ईरानी कर्मचारियों के माध्यम से कर रहा है।
INSTC के लिए क्यों अहम है चाबहार
भारत और ईरान चाबहार बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का अहम हिस्सा बनाने पर काम कर रहे हैं। यह प्रोजेक्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंच देता है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है।
10 साल का समझौता, लेकिन निवेश सीमित
मई 2024 में भारत और ईरान के बीच हुए 10 वर्षीय समझौते के तहत भारत शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल का संचालन कर रहा है।
13 मई 2024 को तेहरान में इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (PMO) के बीच हुए इस करार ने अल्पकालिक समझौतों की जगह ली थी। हालांकि, बजट में फंडिंग न होने से यह साफ है कि भारत फिलहाल निवेश को लेकर बेहद सतर्क रुख अपना रहा है।



