Saturday, March 28, 2026

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जातीय जनगणना: क्या है, पिछली बार कब हुई थी और अब क्यों जरूरी मानी जा रही है? जानिए पूरी कहानी

नई दिल्ली/सर्वोदय :- भारत में जातीय जनगणना को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना में जातीय आंकड़े जुटाने की तैयारी शुरू कर दी है। वर्षों से कई राजनीतिक दल इसकी मांग करते आ रहे हैं और अब इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
लेकिन सवाल है – जातीय जनगणना आखिर है क्या? पिछली बार यह कब हुई थी? और आज के दौर में यह क्यों जरूरी या विवादास्पद मानी जा रही है? आइए जानते हैं इससे जुड़े हर पहलू को विस्तार से।

क्या है जातीय जनगणना?
जातीय जनगणना का मतलब है – जनगणना के दौरान लोगों से उनकी जाति की जानकारी लेना और उसे व्यवस्थित रूप से दर्ज करना। इससे पता चलता है कि किस जाति के लोग कितनी संख्या में हैं, वे किस क्षेत्र में रहते हैं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है और सरकारी योजनाओं का कितना लाभ उन्हें मिल रहा है।

जातीय जनगणना का इतिहास
1881 में भारत में पहली जनगणना हुई थी और 1931 तक हर जनगणना में जातीय आंकड़े दर्ज किए जाते रहे।
1941 में आंकड़े तो इकट्ठे किए गए, लेकिन उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया।
1951 से सिर्फ अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के आंकड़े लिए जाने लगे।
2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना कराई लेकिन जातीय आंकड़े जारी नहीं किए गए।

अब तक किन राज्यों ने कराई जातीय गणना?
बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अपने स्तर पर जातीय सर्वेक्षण कराए हैं। बिहार में 2023 में हुए सर्वेक्षण में सामने आया कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) की हिस्सेदारी 63% से ज्यादा है।

आंकड़ों में जातियों की बढ़ती संख्या
1931 में देश में 4,147 जातियां दर्ज थीं।
आज यह संख्या बढ़कर 46 लाख से भी ज्यादा बताई जा रही है।
महाराष्ट्र में 1931 में 494 जातियां थीं, जो अब 4.10 लाख तक पहुंच चुकी हैं।

जातीय जनगणना क्यों जरूरी मानी जा रही है?
ओबीसी की वास्तविक जनसंख्या का पता नहीं होने से उन्हें योजनाओं में उपेक्षित माना जाता है। सही आंकड़े मिलने से आरक्षण नीति, शिक्षा, रोजगार और कल्याणकारी योजनाएं अधिक प्रभावी ढंग से लागू हो सकती हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन के लिए भी ये आंकड़े अहम माने जा रहे हैं।

जातीय जनगणना के विरोध में क्या तर्क हैं?
आलोचकों का कहना है कि इससे जातीय विभाजन और सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि यह राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम है, न कि सामाजिक न्याय के लिए। सरकार के पास पहले से ही जरूरी डेटा मौजूद है, जिसकी मदद से नीतियां बनाई जा सकती हैं।

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