न्यूज़ डेस्क/ सर्वोदय न्यूज़:- केंद्र में एनडीए सरकार की वापसी के कुछ ही महीनों बाद बिहार की सियासत में शराबबंदी कानून को लेकर नई बहस छिड़ गई है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar को अब अपने ही गठबंधन सहयोगियों की ओर से इस कानून की समीक्षा की मांग का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून को करीब एक दशक हो चुका है। आंकड़ों के मुताबिक, इस कानून के तहत अब तक 8 लाख से अधिक लोग कानूनी मुकदमों का सामना कर रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में एनडीए के घटक दलों ने इसके प्रभाव और क्रियान्वयन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
मांझी ने उठाई समीक्षा की मांग
Jitan Ram Manjhi ने शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग को खुलकर समर्थन दिया है। उनका कहना है कि इस कानून का सबसे अधिक असर वंचित और गरीब वर्गों पर पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि लंबित मामलों में बड़ी संख्या इन्हीं वर्गों से जुड़ी है।
मांझी ने यह भी कहा कि शराबबंदी के बावजूद राज्य में अवैध शराब की आपूर्ति जारी है। उनके अनुसार, “शराबबंदी कागजों पर है, जबकि जमीनी स्तर पर होम डिलीवरी हो रही है।” उन्होंने आरोप लगाया कि प्रवर्तन की खामियों के कारण बड़े तस्कर बच निकलते हैं, जबकि गरीब लोग गिरफ्त में आ जाते हैं। साथ ही, जहरीली शराब से हो रही मौतों पर भी उन्होंने चिंता जताई।
कुशवाहा की पार्टी ने भी उठाए सवाल
मांझी से पहले Upendra Kushwaha की पार्टी Rashtriya Lok Morcha ने भी सदन में शराबबंदी की विस्तृत समीक्षा की मांग की थी। पार्टी विधायक ने कहा कि कानून लागू होने के बावजूद अवैध रूप से शराब उपलब्ध है और राज्य को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जेडीयू ने मांग को बताया ‘हास्यास्पद’
मुख्यमंत्री की पार्टी Janata Dal United (जेडीयू) ने इस मांग को खारिज कर दिया है। पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि शराबबंदी कानून सर्वसम्मति से पारित हुआ था, ऐसे में अब समीक्षा की मांग करना उचित नहीं है। जेडीयू का दावा है कि शराबबंदी के बाद महिलाओं में सुरक्षा और सामाजिक सशक्तिकरण की भावना बढ़ी है।
क्या बदलेगी शराबबंदी नीति?
एनडीए के घटक दलों की ओर से उठ रही आवाजों ने बिहार की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। शराबबंदी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रमुख नीतियों में से एक रही है। ऐसे में अब यह देखना अहम होगा कि वे सहयोगियों के दबाव के बीच इस कानून में किसी प्रकार के संशोधन या समीक्षा के लिए तैयार होते हैं या नहीं।
फिलहाल, बिहार की सियासत में शराबबंदी मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।



