Sunday, March 22, 2026

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कांग्रेस-राजद के लिए मुसीबत बने बागी विधायक, कार्रवाई को लेकर असमंजस बरकरार

न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- बिहार में हाल ही में संपन्न राज्यसभा चुनावों ने महागठबंधन (INDIA) की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांचों सीटों पर एनडीए की जीत ने विपक्षी गठबंधन को बड़ा झटका दिया है। इस हार की बड़ी वजह विधायकों की गैरहाजिरी और संभावित क्रॉस वोटिंग मानी जा रही है, जिससे अब गठबंधन के भीतर तनाव और असमंजस की स्थिति बन गई है।

कांग्रेस का सतर्क रुख
कांग्रेस फिलहाल अपने गैरहाजिर विधायकों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सावधानी बरत रही है। पार्टी ने सुरेंद्र मेहता, मनोज विश्वास और मनोहर प्रसाद सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और उनके जवाब का इंतजार कर रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, दल-बदल कानून राज्यसभा चुनाव में सीधे लागू नहीं होता, इसलिए निर्णय लेने में जल्दबाजी नहीं की जा रही है।
बताया जा रहा है कि इन तीनों विधायकों की संख्या विधानसभा में कांग्रेस की कुल ताकत का बड़ा हिस्सा है, ऐसे में सख्त कार्रवाई पार्टी के लिए जोखिम भरी हो सकती है।

अंदरूनी चिंता और समीकरण
कांग्रेस के भीतर यह भी डर है कि अगर इन विधायकों पर कड़ी कार्रवाई की जाती है, तो वे अलग गुट बनाकर विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता मांग सकते हैं। इससे पार्टी की स्थिति और कमजोर हो सकती है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि ये विधायक मूल रूप से संगठन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं रहे हैं।

राजद की दुविधा
राजद भी अपने विधायक फैसल रहमान के मामले में उलझन में नजर आ रहा है। उनके वोटिंग में शामिल न होने की वजह उनकी मां की गंभीर बीमारी बताई गई है। फिलहाल पार्टी ने कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया है। माना जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर बातचीत के बाद ही आगे का फैसला लिया जाएगा।

विधायकों की सफाई
कांग्रेस के नाराज विधायकों ने राजद पर उपेक्षा का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विपक्षी उम्मीदवार के चयन में उनसे राय नहीं ली गई। वहीं, राजद विधायक ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए अनुपस्थिति को जायज ठहराया है।

एनडीए का पलटवार
एनडीए नेताओं ने विपक्ष की हार को उनकी अंदरूनी कमजोरी का परिणाम बताया है। उनका कहना है कि गठबंधन अपनी एकता बनाए रखने में नाकाम रहा, जबकि एनडीए संगठित तरीके से चुनाव लड़ने में सफल रहा।

चुनाव का गणित समझें
16 मार्च को राज्यसभा की पांच सीटों के लिए मतदान हुआ था। 243 सदस्यीय विधानसभा में जीत के लिए 41 वोट जरूरी थे। विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद चार विधायकों की गैरहाजिरी ने पूरा समीकरण बिगाड़ दिया। इसका फायदा एनडीए को मिला और उसने सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया।

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