न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- हर भक्त यही चाहता है कि उसकी पूजा-पाठ में कोई कमी न रह जाए और भगवान उससे प्रसन्न रहें। लेकिन यह सवाल अक्सर मन में उठता है — आखिर हमें कैसे पता चले कि भगवान हमसे खुश हैं या नाराज?
वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज जी ने अपने प्रवचन के दौरान इस प्रश्न का सुंदर उत्तर दिया।
जब मन अच्छे कर्मों में लगने लगे…
प्रेमानंद महाराज जी ने कहा —“जब हमारा मन अच्छे कार्यों में लगने लगे, जब संतों की बातें प्रिय लगने लगें, जब शास्त्रों के वचन श्रद्धा से सत्य लगें, जब बुजुर्गों की सेवा में सुकून मिले और पशु-पक्षियों में भी भगवान का स्वरूप दिखने लगे — तब समझ लेना चाहिए कि भगवान हमसे प्रसन्न हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि जब इसके विपरीत आचरण शुरू हो जाएं, जब मन बुरे कामों में लगने लगे या दूसरों की भलाई में अरुचि हो — तब समझ लेना चाहिए कि हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है और भगवान हमसे प्रसन्न नहीं हैं।
भगवान की प्रसन्नता का असली अर्थ
महाराज जी ने कहा कि भगवान तभी प्रसन्न होते हैं जब हम उनकी आज्ञा के अनुसार चलें। उन्होंने कहा —“भगवान की प्रसन्नता इसी में है कि हम शास्त्रों को जानें, उनका पालन करें। अगर हमें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है, तो संतों से सीखें। लेकिन यदि हम भगवान की आज्ञा के विपरीत चलने लगें, तो यह संकेत है कि वे हमसे प्रसन्न नहीं हैं।”
भगवान की कृपा का अनुभव कैसे करें?
प्रेमानंद महाराज ने बताया कि जब जीवन में भगवद-स्मृति बढ़ने लगे, सत्कर्मों की ओर झुकाव आने लगे और असत आचरणों से बचाव होने लगे — तो यही भगवान की कृपा का सबसे बड़ा संकेत है। भगवान की प्रसन्नता हमें सत मार्ग पर चलाती है और अमंगल से दूर रखती है।



