न्यूज़ डेस्क/सर्वोदय न्यूज़:- बिहार की राजनीति में Bharatiya Janata Party और Janata Dal (United) का गठबंधन लंबे समय से बना हुआ है, लेकिन बीते तीन दशकों में इस गठबंधन की ताकत का संतुलन धीरे-धीरे बदल गया। कभी जेडीयू और उसके नेता Nitish Kumar इस गठबंधन के ‘बड़े भाई’ माने जाते थे, लेकिन अब भाजपा राज्य की राजनीति में एनडीए की ‘सीनियर पार्टनर’ बनती दिख रही है।
हाल ही में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने की इच्छा जताई है। इसके साथ ही बिहार की राजनीति में भाजपा की बढ़ती ताकत और जेडीयू की बदलती स्थिति पर चर्चा तेज हो गई है।
लालू के खिलाफ गठबंधन से शुरुआत
1990 के दशक में Nitish Kumar ने Lalu Prasad Yadav के नेतृत्व वाली राजनीति के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक मोर्चा तैयार किया। उस समय उनकी समता पार्टी का बिहार में अच्छा प्रभाव था।
2000 के विधानसभा चुनाव से पहले तक नीतीश कुमार बिहार में एक प्रमुख नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे। झारखंड अलग होने से पहले यह संयुक्त बिहार का आखिरी चुनाव था।
2005: एनडीए सरकार और जेडीयू की मजबूत स्थिति
अक्टूबर 2005 में पहली बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी। इस चुनाव में जेडीयू ने 88 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 55 सीटें मिलीं। उस समय गठबंधन में जेडीयू स्पष्ट रूप से सीनियर पार्टनर थी।
2010: नीतीश कुमार की लोकप्रियता का चरम
2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा। पार्टी ने 115 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को 91 सीटें मिलीं। सीट शेयरिंग में भी जेडीयू को ज्यादा सीटें मिली थीं और गठबंधन में उसकी स्थिति मजबूत बनी रही।
2013–2014: गठबंधन टूटने से बदला समीकरण
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब Narendra Modi को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तो नीतीश कुमार ने असहजता जताई और 2013 में भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। इसके बाद उन्होंने Rashtriya Janata Dal और Indian National Congress के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया, जबकि जेडीयू सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई। यह पहला संकेत था कि बिहार में भाजपा का स्वतंत्र जनाधार मजबूत हो चुका है।
2015: महागठबंधन की जीत, भाजपा का बढ़ता वोट शेयर
2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार राजद और कांग्रेस के साथ चुनाव लड़े और गठबंधन ने जीत हासिल की। हालांकि भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ते हुए भी लगभग 24.4% वोट शेयर हासिल किया, जो किसी भी अकेली पार्टी से अधिक था।
2017: नीतीश की एनडीए में वापसी
2017 में Nitish Kumar ने फिर से एनडीए का दामन थाम लिया। लेकिन इस बार राजनीतिक समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। भाजपा की राजनीतिक ताकत और सौदेबाजी की स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत हो चुकी थी।
2020: भाजपा पहली बार जेडीयू से आगे
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने मिलकर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा को 74 सीटें मिलीं, जबकि जेडीयू सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई। यह पहली बार था जब एनडीए के भीतर भाजपा सीटों के मामले में जेडीयू से काफी आगे निकल गई।
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हालांकि मुख्यमंत्री पद पर Nitish Kumar ही बने रहे, लेकिन गठबंधन में भाजपा ‘बड़े भाई’ की भूमिका में आ गई। इस चुनाव में Chirag Paswan की पार्टी ने जेडीयू की कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिससे जेडीयू को नुकसान हुआ।
2024 और 2025: भाजपा की स्थिति और मजबूत
2024 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू और भाजपा को बराबर सीटें मिलीं और दोनों दलों के 12-12 सांसद चुने गए। इसके बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि जेडीयू को 85 सीटें मिलीं। पहली बार ऐसा हुआ जब एनडीए में रहते हुए जेडीयू और भाजपा ने बराबर सीटों (101-101) पर चुनाव लड़ा।
भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा का कोर वोट बैंक लगातार स्थिर बना रहा, जबकि जेडीयू का वोट शेयर गठबंधन बदलने और सत्ता विरोधी लहर के कारण प्रभावित हुआ।
2014 के बाद भाजपा ने बिहार के ग्रामीण इलाकों और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में अपनी पकड़ मजबूत की। यह वही सामाजिक आधार था जिसे पहले Nitish Kumar की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था।



