नई दिल्ली/सर्वोदय न्यूज़: महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव के रुख में बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। अप्रैल 2026 में संसद के दौरान जहां सपा ने इन प्रस्तावों का विरोध किया था, वहीं अब आगामी मानसून सत्र से पहले अखिलेश यादव ने कुछ शर्तों के साथ महिला आरक्षण बिल का समर्थन करने के संकेत दिए हैं।
संसद में पीएम मोदी ने किया था ‘मित्र’ का जिक्र
16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा था कि “अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, जो कभी-कभी हमारी मदद कर देते हैं।” उस समय हालांकि समाजवादी पार्टी ने सरकार का समर्थन नहीं किया था और विपक्ष के साथ खड़ी नजर आई थी।
महिला संगठनों से मुलाकात के बाद बदला रुख
मंगलवार को महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से महिला आरक्षण को लेकर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण का समर्थन किया जा सकता है, लेकिन इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी जरूरी हैं।
सपा ने रखीं तीन प्रमुख मांगें
अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दे पर सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं।
- महिला आरक्षण को 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से लागू किया जाए।
- महिला आरक्षण केवल लोकसभा तक सीमित न रहकर राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदनों में भी लागू किया जाए।
- पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) वर्ग की महिलाओं, विशेषकर पिछड़े समाज और मुस्लिम महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
मानसून सत्र पर टिकी निगाहें
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को फिर से आगे बढ़ा सकती है। ऐसे में सपा के बदले हुए रुख को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि पार्टी ने स्पष्ट किया है कि उसका समर्थन सरकार की ओर से इन मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाने पर निर्भर करेगा।
राजनीतिक हलकों में तेज हुई चर्चा
अखिलेश यादव के इस बदले रुख को लेकर राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग तरह की चर्चाएं हैं। कुछ विश्लेषक इसे बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच रणनीतिक कदम मान रहे हैं, जबकि सपा इसे महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाने की कोशिश बता रही है।
अब सभी की निगाहें संसद के आगामी मानसून सत्र पर हैं, जहां यह साफ हो सकेगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और महिला आरक्षण विधेयक को लेकर विपक्ष की अंतिम रणनीति क्या होगी।



